राजीव गांधी हत्याकांड मामले में घटनाक्रम

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Thursday, February 20, 2014-11:39 AM

चेन्नई: राजीव गांधी हत्याकांड मामले में पिछले 23 वर्षों में कई नाटकीय मोड़ देखने को मिले हैं। हालांकि, 26 आरोपियों को 1998 में यहां की टाडा अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी लेकिन उच्चतम न्यायालय ने सिर्फ मुरगन, संथन (दोनों श्रीलंकाई), ए जी पेरारीवलन और नलिनी (मुरगन की पत्नी) की मौत की सजा की पुष्टि की। तमिलनाडु मंत्रिमंडल के फैसले और साल 2000 में राज्यपाल के इसे मंजूरी देने के बाद नलिनी की मौत की सजा आजीवन कारावास में तबदील कर दी गई। तीन अन्य की दया याचिका राष्ट्रपति ने खारिज कर दी थी।


21 मई 1991: पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की श्रीपेरंबुदूर में एक चुनावी रैली में लिट्टे की आत्मघाती हमलावर ने हत्या की।


20 मई 1992: सीबीआई के विशेष जांच दल (एसआईटी) ने मामले में यहां पूनामल्ली में विशेष टाडा अदालत में आरोप पत्र दायर किया।


28 जनवरी 1998:
टाडा अदालत ने सभी 26 आरोपियों को मौत की सजा सुनाई

11 मई, 1999: उच्चतम न्यायालय ने नलिनी, संथन, मुरगन और पेरारिवलन को मौत की सजा सुनाई, तीन अन्य की मौत की सजा आजीवन कारावास में तब्दील की, 19 अन्य को मुक्त किया।

8 अक्तूबर, 1999: उनकी अपील को खारिज करते हुए उच्चतम न्यायालय ने नलिनी, संथन, मुरगन और पेरारिवलन की मौत की सजा की पुष्टि की।

17 अक्तूबर, 1999: मौत की सजा का सामना कर रहे चार दोषियों ने तमिलनाडु के राज्यपाल के पास अपनी दया याचिका भेजी

27 अक्तूबर 1999: राज्यपाल ने दया याचिका खारिज की।

25 नवंबर 1999: मद्रास उच्च न्यायालय ने दया याचिका खारिज करने के राज्यपाल के फैसले को खारिज किया, राज्यपाल को राज्य मंत्रिमंडल की राय लेने के बाद नए सिरे से आदेश देने को कहा।

19 अप्रैल 2000: तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करणानिधि की अध्यक्षता वाले राज्य मंत्रिमंडल ने नलिनी की मौत की सजा उम्रकैद में तब्दील करने की सिफारिश करने का फैसला किया।

21 अप्रैल 2000: राज्यपाल ने नलिनी की मौत की सजा आजीवन कारावास में तब्दील करने के मंत्रिमंडल के फैसले को स्वीकार किया।

28 अप्रैल 2000: राज्य सरकार ने संथन, मुरगन और पेरारिवलन की दया याचिका राष्ट्रपति को भेजी।

12 अगस्त 2011: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दया याचिका खारिज करने के राष्ट्रपति के फैसले के बारे में राज्य सरकार को जानकारी दी।

26 अगस्त 2011: तीन दोषियों को फांसी देने की तारीख नौ सितंबर 2011 को निर्धारित की।

30 अगस्त 2011: तमिलनाडु विधानसभा ने तीनों की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने के लिए राष्ट्रपति से अनुरोध करने के लिए प्रस्ताव पारित किया।

30 अगस्त 2011: मद्रास उच्च न्यायालय ने संथन, मुरगन और पेरारिवलन की याचिकाओं पर उनकी फांसी पर रोक लगाई। याचिकाएं बाद में उच्चतम न्यायालय को स्थानांतरित की गईं।

1 मई 2012: उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वह तीनों दोषियों की याचिकाओं पर सुनवाई करेगा।

18 फरवरी 2014: उच्चतम न्यायालय ने तीनों दोषियों की दया याचिकाओं के निस्तारण में विलंब के आधार पर उनकी मौत की सजा आजीवन कारावास में तबदील की। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए दोषियों को रिहा करने पर विचार कर सकती है।

19 फरवरी 2014: राज्य मंत्रिमंडल ने संथन, मुरगन, पेरारिवलन, नलिनी, रॉबर्ट पायस, जयकुमार और रविचंद्रन को तत्काल रिहा करने का फैसला किया, सीआरपीसी की धारा 435 के तहत केंद्र को अपना फैसला भेजा।


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