आपदा सुरक्षा कार्यों में कहीं लेट-लतीफी फिर न पड़ जाए भारी!

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Saturday, February 22, 2014-5:44 PM

उत्तरकाशी: दो साल उत्तरकाशी में लगातार आपदा आ चुकी है। 2012 में अगस्त में और 2013 में जून में बाढ़ और अतिवृष्टि ने कहर बरपाया था। इन दोनों आपदाओं ने न केवल जिले को कई साल पीछे धकेल दिया है बल्कि लोगों को सोचने के लिए भी मजबूर कर दिया है। लोग अभी भी भविष्य को लेकर चिंतत है। वैसे यहां 2012 की बाढ़ के बाद सबक लिया जाता तो 2013 में कम नुक्सान होता इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा रहा है क्योंकि तब बगैर प्लानिंग के यहां करोड़ों बहे थे। इधर इस बार भी हालत वैसे ही हैं जैसे पिछले वर्षों में थे। आपदा प्रभावितों की सुरक्षा, तटबंधों की सुरक्षा, रास्ते, पुल तथा गंगा और अस्सी गंगा में साढ़े तीन मीटर से ऊपर ऊंचे हुए आर.बी.एम. को हटाने या फिर चैनेलाइज करने में देरी के परिणामस्वरूप 2013 में कहीं अधिक तबाही होना प्रमुख काना माना जा रहा है।

इस बार भी जिस तरह से आपदा सुरक्षा के कार्यों की कछुआ चाल है। उससे नहीं लगता कि जल स्तर बढऩे से पहले सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हो सकेंगे। गौरतलब है कि 2012 की बाढ़ आने के बाद सुरक्षा के कार्य कराए जाने के लिए निर्माण एजैंसियां तब गंगा व अन्य नदी नालों में उत्तरी थी जब इनमें जल स्तर बढऩे लगा था। अंतत: एजैंसियों को अपना तामझाम छोड़कर भागना पड़ा था। उधर मौजूदा समय में ठीक यही स्थिति जल्द बनने को दिखाई दे रही है। तिलोथ ज्ञानसू, जोशियाड़ा, गंगोरी के तटबंधों को कसने का कार्य शुरू नहीं हो सका हैं। इन क्षेत्रों के तटबंधों को यदि नहीं कसा गया तो मानसून में खतरा तय मानकर लोग चल रहे हैं। जिले के डी.एम. श्रीधर बाबू अद्दांकी ने स्थिति को देखते हुए जल विद्युत निगम को नदी के तटबंधों में सुरक्षा दीवार बनाए जाने के लिए कार्य तत्काल शुरू करने के निर्देश जरूर दिए हैं।

इस बीच सुरक्षा दीवारों के निर्माण जल्द से जल्द हों इस पर आम जनता का कहना है कि आपदा को देखते हुए नदी क्षेत्र में कार्य करने जा रही एजैंसियों को नियम कानून में ढिलाई दी जाए। नदी में जमा खनिज में नदी में ही सामग्री तैयार कर उसे शहर की सुरक्षा में लगाया जाए ताकि जल्द से जल्द कार्य हों और आबादी क्षेत्र की सुरक्षा हो सकें।
 


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