कहीं मजबूरी तो नहीं अन्ना-दीदी की गलबहियां?

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Sunday, February 23, 2014-10:52 AM

कोलकाता: अन्ना हजारे का तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी को दिया गया आशीर्वाद भले ही राजनीतिक विश्लेषकों को हैरत में डाल रहा हो, लेकिन सपाट तौर पर यह राष्ट्रीय अहमियत का सपना देख रहे एक क्षेत्रीय क्षत्रप और भ्रष्टाचार विरोधी एक ऐसे नायक के बीच सुविधाजनक समझौता है जो अपनी आधी से ज्यादा सेना और शीर्ष जनरलों को खो चुका है। किसी भी राजनीतिक दल को समर्थन नहीं देने के अपने रुख से हटते हुए हजारे ने न केवल यह कहा कि बनर्जी के साथ ही भारत में बदलाव आ सकता है, बल्कि उन्होंने तृणमूल के लिए प्रचार करने की बात कहकर कई लोगों की त्योरी चढ़ा दी।

 

अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को सामने रखते हुए तृणमूल को अखिल भारतीय स्तर की पार्टी बनाने पर जोर देने के कई दिनों बाद बनर्जी के विश्वासपात्र सिपहसालार और पार्टी महासचिव मुकुल राय ने गांधीवादी कहे जाने वाले अन्ना के मुंह से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की सादगी और निष्ठा के कसीदे पढ़वाकर राजनीतिक क्षितिज पर भूचाल लाने का प्रयास किया। बनर्जी के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए हजारे ने तृणमूल अध्यक्ष की सराहना करते हुए कहा कि विभिन्न राजनीतिक दलों को 17 सूत्री एजेंडे का जवाब केवल इन्होंने ही दिया। इसी दौरान अन्ना ने अपने पूर्व जनरल अरविंद केजरीवाल को समर्थन देने की संभावना खारिज कर दी।

 

अरविंद ने अन्ना की इच्छा के खिलाफ आम आदमी पार्टी (आप) का गठन किया और दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। पद से इस्तीफा दे चुके अरविंद संभवत: अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी हो सकते हैं। अन्ना-ममता गलबहियां से न केवल तृणमूल के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भन्ना गए, बल्कि अधिकारवादी कार्यकर्त्ताओं और संगठनों का एक गुट भी उत्तेजित है। राजनीतिक विश्लेषक अनिल कुमार जना का मानना है कि यह आपसी हितों को साधने के लिए बेमेल समझौता है। जना ने आईएएनएस से कहा, ‘‘अभी तक सम्मानित व्यक्ति माने जा रहे अरविंद के अलग होने से हुई क्षति की भरपाई के लिए अन्ना ममता के करीब संभवत: प्रचारों में बने रहने के लिए आए हैं। यह उनका अपने राजनीतिक महत्व को पुर्नस्थापित करने का प्रयास है।’’

 

जना ने कहा कि और बनर्जी के लिए अन्ना का साथ उन्हें तृणमूल को राष्ट्रीय स्तर पर पांव पसारने का मंच और मई में होने वाले आम चुनाव के बाद उन्हें किंगमेकर की भूमिका अदा करने की महत्वकांक्षा को पूरा करने वाला लगता है। राजनीतिक विश्लेषक समीर दास को भी लगता है कि अन्ना के साथ जुडऩे से बनर्जी को फायदा हो सकता है।


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