शिवरात्रि पर भक्तों के लिए अच्छी खबर....

  • शिवरात्रि पर भक्तों के लिए अच्छी खबर....
You Are HereNational
Thursday, February 27, 2014-10:26 AM

मथुरा: उत्तर प्रदेश के मथुरा में भगवान भोलेनाथ की शिवचौदस ब्रज भूमि में जहां अधिकांश मंदिरों में यह पर्व 27 फरवरी को मनाया जा रहा है वहीं कुछ मंदिरों में यह पर्व 28 फरवरी को मनाया जायेगा। मंदिर के सेवायत आचार्य राम गोपाल गोस्वामी के  अनुसार मंदिर में जहां 27 फरवरी को जागरण के साथ चार प्रहर की आरती होगी वहीं 28 फरवरी को जलाभिषेक होगा। इस ऐतिहासिक घटना के कारण शिवरात्रि पर इस मंदिर में जलाभिषेक के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर की तरह जनसमूह उमडता है। 

उन्होने बताया कि ब्रज भूमि में शिवरात्रि उसी प्रकार से मनाई जाती है जिस प्रकार से यहां पर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है और इस बार यह पर्व ब्रज के मंदिरों में दो दिन मनाया जा रहा है। अपनी धार्मिकता के कारण ब्रजभूमि की अपनी अलग ही पहचान है। यहां पर सभी त्यौहार पूरे जोश खरोश से मनाए जाते हैं और शिव चौदस पर तो ब्रजभूमि काशी बन जाती है।


हजारों कांवरियों द्वारा बाहर से गंगाजल लाना, कांवरियों की जगह जगह आवभगत, शिवमंदिरों में पूजन और अर्चन के उमड़ता सैलाब जहां इस नगरी को शिव की नगरी बना देता हैं वहीं पर श्रीकृष्ण जन्मस्थान से अनूठी शिव बारात निकाली जाती है। भोलेनाथ ने शिव चौदस को पार्वती के संग होली खेली थी तभी तो ब्रज के रसिया में गाया जाता है। 

होली खेल रहे शिव शंकर भोला पार्वती के  संग। ब्रज में यह भी मान्यता है कि बाघम्बरधारी भोलेनाथ यहां हर समय ब्रजवासियों का कल्याण करने के  लिए विराजमान रहते है। यहां के चार मंदिर में विराजमान भोलेनाथ को ब्रज के  कोतवाल की संज्ञा दी गई है। 

मथुरा में भूतेश्वर, वृन्दावन में गोपेश्वर, गोवर्धन में चकलेश्वर एवं कामा में कामेश्वर को ब्रज के  कोतवाल कहा जाता क्यो कि ऐसा माना जाता है कि ब्रजभूमि पर आने वाली किसी विपदा को भगवान भोलेनाथ उसी प्रकार अपने पर ले लेते हैं जिस प्रकार सागर मंथन के बाद उन्होंने विषपान किया था।  मान्यता यह है कि पहली बार भोलेनाथ साधुवेश में उस समय आएथे जब मां यशोदा और नन्दबाबा के नन्दगांव स्थित घर में बालस्वरूप में शयाम सुन्दर आए थे।

कहते हैं बाघम्बरधारी भोलेनाथ को जब मां यशोदा ने इस कारण दर्शन कराने से मना कर दिया कि लाला डर जाएगा तो उन्होंने निश्चय किया कि वे श्याम सुंदर से मिलकर ही जाएंगे। मां यशोदा के  मना करने पर वे वहीं कु छ दूर पर धूनी रमाकर बैठ गए जब शयाम सुन्दर को यह पता चला तो वे भोलेनाथ के जाने के बाद और जोर जोर से रोने लगे। विचलित यशोदा से जब अन्य महिलाओं ने कहा कि उस साधु को बुला लिया जाय हो सकता है कि उसने ही कोई टोटका किया हो तो मां यशोदा तैयार हो गईं। 

भोलेनाथ के  जैसे ही शयाम सुन्दर से नेत्र मिले तो वे खिल खिलाकर हंसने लगे। इसके  बाद भोलेनाथ वहां से चले गए। बाद में उसी स्थान पर आशेश्वर महादेव का मंदिर बन गया। किंतु मंदिर में मूल विग्रह के वल भोलेनाथ का ही पाषाण में है क्योंकि भोलेनाथ अके ले ही शयाम सुन्दर से मिलने आए थे। वृन्दावन का गोपेश्वर मंदिर भोलेनाथ के  ब्रज में आने की उस घटना का गवाह है जिसमें वे महारास देखने के  लिए वृन्दावन आए थे और महारास के  अंदर उन्हें तभी प्रवेश मिला था जब उन्होंने गोपी रूप धारण कर लिया था। 

इस ऐतिहासिक घटना के  कारण शिवरात्रि पर इस मंदिर में जलाभिषेक के  लिए काशी विश्वनाथ मंदिर की तरह जनसमूह उमडता है। इसी प्रकार शिवरात्रि पर यहां के  रंगेश्वर, पिपलेश्वर, भूतेश्वर, गल्तेश्वर, गोकर्णनाथ महादेव आदि मंदिरों में शिवभों का समूह उमडता है तो श्रीकृष्ण जन्मस्थान से शिव बारात निकलती है।कुल मिलाकर शिवरात्रि पर ब्रजभूमि शिवनगरी का स्वरू प प्रस्तुत करने लगती  है।



 

विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You