मौत की सजा उम्रकैद में बदलने का फैसला गैरकानूनी: केंद्र

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Saturday, March 01, 2014-6:07 PM

नर्इ दिल्ली:  केंद्र सरकार ने दया याचिकाओं के निपटारे में विलम्ब को अपराधियों के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलने का पर्याप्त आधार बताने संबंधी फैसले की समीक्षा का उच्चतम न्यायालय से आग्रह किया है।
 
केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में आज एक पुनरीक्षण याचिका दायर करके उससे आग्रह किया कि वह अपने 21 जनवरी के उस फैसले की समीक्षा करे जिसमें उसने दया याचिकाओं के निपटारे में देरी को फांसी की सजा कम करने का व्यापक आधार माना है।
 
केंद्र की दलील है कि न्यायालय का यह फैसला तीन सदस्यीय खंडपीठ ने दिया है. जबकि ऐसे संवेदनशील मामलों को संविधान पीठ के समक्ष रखा जाना चाहिए था1 इस तरह के मामलों में फैसला देना तीन सदस्यीय खंडपीठ के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
 
सरकार ने यह भी दलील दी है कि गत 21 जनवरी के न्यायालय के इस फैसले से 15 कुख्यात अपराधियों की फांसी की सजा आजीवन कारावास में तो बदल ही गई. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों के भी फांसी के फंदे से बच निकलने का मार्ग प्रशस्त हो गया।

पुनर्विचार याचिका में कहा गया है कि शीर्ष अदालत के इसे फैसले से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त (जीने का मौलिक अधिकार) अब परोक्ष रूप से अपराधियों का भी अधिकार बन गया है।  जबकि इस तरह के संवैधानिक मामलों की सुनवाई संविधान के अनुच्छेद 145 के तहत कम से कम पांच सदस्यीय संविधान पीठ को करना चाहिए था। 

सरकार ने उच्चतम न्यायालय के एक फैसले का भी हवाला दिया है जिसमें यह कहा गया है कि फांसी की सजा कम करने के मामले में अपराध की प्रकृति का ध्यान रखा जाना चाहिए।
 

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