जाट आरक्षण: अजित के तरकश का आखिरी तीर

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Tuesday, March 04, 2014-10:08 AM

नई दिल्ली(हर्ष कुमार सिंह) :इस बार अपने राजनीतिक जीवन की दूसरी संभावित हार से घबराए केंद्रीय मंत्री चौ. अजित सिंह ने केंद्रीय सेवाओं में जाट आरक्षण को ओबासी कोटे के तहत आरक्षण तो दिलवा दिया लेकिन इसके बाद भी खतरा टला नहीं है। वेस्ट यूपी में जाट मतदाताओं में जबर्दस्त पकड़ रखने वाले अजित सिंह और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल को दिलासा तो मिला होगा लेकिन सुकून नहीं। मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद जाटों का रुझान भारतीय जनता पार्टी की ओर बढऩे की रिपोर्ट लगातार मिल रही हैं। कहा जा रहा है कि वेस्ट यूपी का जाट अजित से नाराज है क्योंकि अजित ने जाटों की मदद के लिए दंगों के दौरान कुछ नहीं किया था।

ये सही है कि छोटे चौधरी की नींद मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से उड़ी हुई है। सब जानते हैं कि दंगों में जाट और मुस्लिम, दोनों समुदायों के लोग मारे गए थे। अखिलेश यादव ने मुस्लिम परिवारों को पांच-पांच लाख रुपये दिए और मरने वाले के घर से एक-एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी दे दी गई, लेकिन जाट पक्ष के साथ ऐसा नहीं हो सका। यही नहीं जब पूरा वेस्ट यूपी दंगे की आग में तप रहा था तो अजित सिंह ने मुजफ्फरनगर तो दूर की बात अपने गृह क्षेत्र बागपत का भी दौरा नहीं किया था। जबकि दंगा बागपत, मेरठ तक पहुंच गया था। लगभग एक पखवाड़े के बाद अजित के बेटे और मथुरा के सांसद जयंत ने मेरठ में दौरा जरूर किया था पर उन्हें अखिलेश यादव सरकार ने मुजफ्फरनगर की सीमा में प्रवेश करने से रोक दिया था। तभी से जाट समुदाय में अजित और उनके दल के प्रति नाराजगी है। हालांकि अजित ने ये कहकर अपनी जान बचाने की कोशिश की थी कि उन्होंने ही सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी का दौरा मुजफ्फरनगर में कराया था लेकिन इसके बाद भी जाटों की नाराजगी कम होती नजर नहीं आ रही थी। 

रही सही कसर विभिन्न एजैंसियों के पिछले कुछ महीनों में कराए ओपिनियन पोल के परिणामों ने पूरी कर दी थी। एबीपी-नीलसन के सर्वे के मुताबिक तो इस बार अजित सिंह की पार्टी अपनी पांच लोकसभा सीटों में से केवल एक ही बचाने में सफल हो पाएगी। ये अजित और उनके बेटे जयंत की सीट में से कोई एक हो सकती है। इसी प्रकार की रिपोर्ट अन्य पोल भी दे रहे हैं। यही वजह है कि चौधरी अजित सिंह ने लोकसभा चुनाव नजदीक आ जाने के बाद भी कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने जाटों के आरक्षण के लिए प्रयास जारी रखे और कांग्रेस आलाकमान को इसके लिए राजी करने में सफल रहे। 

2009 में अजित सिंह ने भाजपा के गठबंधन से पांच सीटें जीती थी लेकिन बाद में कांग्रेस के साथ जाकर केंद्र में मंत्री बन गए थे। इस बार भाजपा ने भी साफ कर दिया था कि उन पर भरोसा नहीं किया जाएगा। अजित ने विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस से अपनी यारी निभाई थी और गठबंधन की कितनी बुरी हालत हुई थी ये किसी से छिपा नहीं है।

ताजा हालात में अजित के सामने केंद्र में जाट आरक्षण का ब्रह्मास्त्र चलाने के अलावा कोई चारा नहीं था। उन्होंने चुनाव की घोषणा होने से पहले आनन फानन में सोनिया और राहुल गांधी को सहमत करते हुए जाटों को केंद्र में आरक्षण देने पर राजी करा लिया। इससे पहले अजित सिंह जाटों को आरक्षण दिलाने की बात कहते तो रहे हैं लेकिन कभी इतनी ताकत से इसके लिए प्रयास करते नजर नहीं आए। बताया जाता है कि खुद जयंत चौधरी ने राहुल से मिलकर इस मसले पर बात की। कांग्रेस के सामने मजबूरी ये थी कि यूपी में उसका कोई ठोस आधार नहीं है और केवल रालोद ही उसका यहां एकमात्र सहारा है।

घेराबंदी से बच पाएंगे अजित ?

लोकसभा चुनाव के लिए अजित की जबर्दस्त घेराबंदी की जा रही है। चौधरी चरण सिंह के समय से ही रालोद हमेशा जाट और मुस्लिम मतों को एक जगह लाकर जीतती रही है पर इस बार ये काम आसान नहीं नजर आ रहा है। पहले समाजवादी पार्टी ने उनके सामने पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री को प्रत्याशी बनाया था। शास्त्री वो शख्स हैं जिन्होंने अजित सिंह को उनकी राजनीतिक जीवन की एकमात्र हार का स्वाद चखाया था। भाजपा के बैनर पर शास्त्री ने उन्हें हराया था और इसके इनाम स्वरूप उन्हें केंद्र में कृषि मंत्री बनाया गया था। हालांकि वे उस सरकार का हिस्सा थे जो 13 महीने ही चली थी। वाजपेयी सरकार अल्पमत में आने के बाद गिर गई थी और फिर जब दोबारा चुनाव हुए तो अजित ने शास्त्री को हरा दिया था। उस समय जाटों का तर्क था कि अजित की हार के बाद उनकी आवाज उठाने वाला कोई नहीं रहा था। बाद में सोमपाल की बात भाजपा से बिगड़ गई। वे कांग्रेस में भी गए और इस बार सपा से प्रत्याशी बन गए लेकिन मुजफ्फरनगर दंगे के बाद उन्हें लगा कि जाट तो सपा को वोट देंगे नहीं ऐसे में चुनाव लडऩे का मतलब आत्महत्या करने के समान होगा। उन्होंने टिकट वापस कर दिया तो मुलायम ने तुरंत सिवाल खास (बागपत) के विधायक गुलाम मोहम्मद को टिकट दे दिया। दूसरी ओर, भाजपा ने मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह को टिकट देने का मन बना लिया है। ऐसे में अजित के जाट वोट तो कटेंगे ही। मुसलमानों की पहली पसंद भी जाहिर तौर पर सपा का मुस्लिम प्रत्याशी रहेगा। बसपा के बैनर पर एमएलसी प्रशांत चौधरी (गुर्जर) प्रत्याशी हैं। इन हालात में अजित की राह आसान नहीं नजर आती। 

" केंद्र में जाट आरक्षण को ओबीसी के तहत सूचीबद्ध किया जाना यूपीए सरकार का एक अहम फैसला है। ये बैकवर्ड क्लास को आगे लाने का एक प्रयास है और इसके लिए चौ. अजित सिंह का योगदान सराहनीय है। आने वाली पीढिय़ां राष्ट्रीय लोकदल को इसके लिए हमेशा याद रखेंगी। इससे पिछड़ी जातियों के युवाओं को आगे बढऩे का मौका मिलेगा।" - जयंत चौधरी, सांसद, राष्ट्रीय लोकदल

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