मुलायम की नाराजगी पर उठते सवाल!

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Wednesday, March 05, 2014-1:33 PM

लखनऊ: कई बार सार्वजनिक मंचों से अखिलेश सरकार के मंत्रियों की आलोचना कर चुके समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने इस बार अपने पुत्र और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर ही निशाना साधा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या वाकई मुलायम अपनी पार्टी की सरकार से नाराज हैं या सरकार विरोधी गुस्से को कम करने की उनकी ये रणनीति है।

अखिलेश सरकार के दो साल के कार्यकाल के दौरान मुलायम ने कई बार सरकार के मंत्रियों के कामकाज पर उंगली उठाई। मंगलवार को राज्य सरकार के कार्यक्रम में मुलायम ने मंत्रियों के साथ-साथ अपने बेटे एवं मुख्यमंत्री अखिलेश पर भी निशाना साधा।

मुलायम ने अखिलेश को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘आप चापलूसों से घिरे हो। चापलूसी में मत फंसो। चापलूसों से घिरे लोग हमेशा धोखा खाते हैं। दो साल में जैसा कामकाज होना होना चाहिए था वैसा नहीं हुआ। सरकार पार्टी को कमजोर कर रही है।’’

सवाल उठ रहे हैं कि अगर मुलायम वाकई नाराज हैं, तो फिर वे उचित कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं। राजनीतिक गलियारे में उनके इस गुस्से को लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी और अपनी छवि सुधारने की कयावद के रूप में भी देखा जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार विजय उपाध्याय कहते हैं, ‘‘अखिलेश यादव सरकार के दो साल के कार्यकाल में सरकार के कामकाज, खासकर कानून व्यवस्था को लेकर जनता में भारी नाराजगी है। मुलायम किसी भी तरह इस ‘सरकार विरोधी लहर’ का असर लोकसभा चुनाव पर नहीं पडऩे देना चाहते हैं। वह यह संदेश देना चाहते हैं कि अगर जनता नाराज है, तो खुद वह भी नाराज हैं और इसीलिए सरकार को लगातार सुधरने की चेतावनी दे रहे हैं।’’

जानकारों का कहना है कि मुलायम को पता है अगले लोकसभा चुनाव में उन्हें अखिलेश सरकार के कामकाज के आधार पर ही वोट मिलेगा। उनका प्रधानमंत्री बनने का सपना तभी पूरा होगा जब सपा उत्तर प्रदेश में कम से कम 40 सीटें जीते। यह तभी संभव होगा जब सरकार को लेकर चल रही विरोध की लहर चुनाव पर हावी न हो जाए।

राजनीतिक विश्लेषक रमेश दीक्षित कहते हैं, ‘‘अपनी पार्टी की सरकार पर निशाना साधने की मुलायम की ये चाल उल्टी भी पड़ सकती है। मुलायम अखिलेश के पिता भी हैं। ऐसे में अगर वह अपने बेटे की सरकार से खुश नहीं हैं, तो लोगों के बीच इसका गलत संदेश भी जाएगा। अगर कोई मंत्री काम नहीं कर रहा है और वह गुस्सा हैं, तो उस पर कार्रवाई करें।’’

वरिष्ठ पत्रकार अल्का पांडे कहती हैं, ‘‘यह मजेदार बात है कि जब मुलायम सपा सरकार की आलोचना करें तो ठीक, लेकिन जब विपक्ष आचोलना करती है, तो वे सरकार का बचाव करने लगते हैं। ऐसी स्थिति में जनता भ्रमित होती है कि आखिर हो क्या रहा है। मुलायम की यह रणनीति लोकसभा चुनाव में पार्टी के खिलाफ  भी जा सकती है।’’

हालांकि सपा के नेता इस बात से सहमत नहीं है कि मुलायम की इस नाराजगी का लोकसभा चुनाव में उल्टा असर भी पड़ सकता है।

सपा के वरिष्ठ नेता एवं संसदीय बोर्ड के सदस्य नरेश अग्रवाल कहते हैं, ‘‘मुलायम पार्टी के मुखिया हैं। उन्हें सरकार को नसीहत देने का अधिकार है। जब उन्हें किसी बात पर शिकायत होती है, तो वह सार्वजनिक रूप से उसे कह देते हैं। सरकार उनके निर्देशों का पालन करती है। इससे यह संदेश जाएगा कि पार्टी का सरकार पर अंकुश है। सपा एक लोकतांत्रिक पार्टी है। दूसरी पार्टियों के अध्यक्ष इस तरह अपनी सरकार की आलोना करने की हिम्मत नहीं जुटा सकते।’’

विपक्षी दलों का कहना है कि अगर मुलायम को नाराजगी है तो वह कार्रवाई करें। बार-बार गुस्सा करने से तो यही साबित होता है कि उनके निर्देशों और नाराजगी का सरकार पर कोई असर नहीं पड़ रहा है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक कहते हैं, ‘‘हम तो पहले से ही कह रहे हैं कि दो साल में अखिलेश सरकार के कार्यकाल में कामकाज नहीं हुआ। यही बात अब मुलायम कह रहे हैं। वह कहना छोड़कर कार्रवाई करें। जनता उनकी चाल समझ रही है। उन्हें माफ  नहीं करेगी।’’

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