कांग्रेस को झटका मुस्लिम नेता बसपा में

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Sunday, March 09, 2014-12:15 AM
नई दिल्ली(अशोक शर्मा):  दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस के कई नेताओं से खास माने जाने वाले एक मुस्लिम नेता तथा एक अन्य ने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया है।
 
दोनों नेता अब बसपा सुप्रीमो मायावती का साथ पाकर हाथी पर सवार हो गए हैं। कुछ समय पहले तक तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और उनके मंत्रिमंडल में शामिल लोक निर्माण मंत्री राजकुमार चौहान के खासमखास माने जाने वाले यह मुस्लिम नेता हैं शकील सैफी, जो प्रदेश कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रवक्ता थे। कांग्रेस को अलविदा कहने वाले दूसरे हैं दिल्ली हज कमेटी के पूर्व चेयरमैन अब्दुल समी सलमानी।
 
बसपा सुप्रीमो मायावती ने इन दोनों मुस्लिम नेताओं को तोहफा देते हुए दोनों को दिल्ली के 2 संसदीय क्षेत्रों से चुनाव मैदान में उतारने का भी मन बना लिया है, इसकी औपचारिक घोषणा अगले सप्ताह की जाएगी। इतना ही नहीं बसपा सुप्रीमो ने सैफी को दिल्ली मामलों का प्रभारी भी नियुक्त किया है। वह पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र के पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे। सैफी समाज में शकील की काफी पकड़ मानी जाती है।
 
पार्टी का आदेश मिलते ही वह पूर्वी दिल्ली के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में जाकर चुनाव प्रचार में जुट गए हैं। इसके साथ ही बसपा में शामिल हुए सल्मानी को पार्टी ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली से प्रत्याशी बनाया है। वह इस सीट से कांग्रेस के सांसद जयप्रकाश अग्रवाल के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे। प्राप्त जानकारी के अनुसार पार्टी ने दिल्ली के 3 अन्य संसदीय क्षेत्रों से भी चुनाव लड़ाने के लिए प्रत्याशियों का चयन कर लिया है। इनमें पांडेय शर्मा को चांदनी चौक, जार्ज फर्नांडीज को नई दिल्ली और उत्तर-पश्चिम सीट से वसंत पंवार को उतारा जाएगा। 
 
सूत्रों के अनुसार शेष बची 2 सीटों दक्षिण दिल्ली और पश्चिमी दिल्ली संसदीय क्षेत्र के उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया अगले 2 दिनों में पूरी कर ली जाएगी। इन दोनों सीटों पर बसपा के काफी नेताओं ने टिकट के लिए आवेदन किया है, जिनके बारे में गंभीरता से विचार किया जा रहा है।  
 
सैफी ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस ने मुस्लिम वोट पाने के लिए हमेशा राजनीति की है। दिल्ली में लोकसभा की एक भी सीट पर किसी मुस्लिम उम्मीदवार को खड़ा नहीं किया। इससे साफ होता है कि भाजपा और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं है। दोनों ही दल अल्पसंख्यकों को बरगलाते रहे हैं। 
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