दक्षिण दिल्ली संसदीय क्षेत्र में होगी इस बार कांग्रेस की अग्नि-परीक्षा

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Monday, March 10, 2014-1:04 AM
नई दिल्ली(अशोक शर्मा):  5 साल पहले तक बाहरी दिल्ली संसदीय क्षेत्र मतदाताओं की संख्या अत्याधिक होने से देश का दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा संसदीय क्षेत्र था। लेकिन गत लोकसभा चुनाव में इसका अस्तित्व तीन संसदीय क्षेत्रों में विलीन हो गया। अब बाहरी दिल्ली का इलाका दक्षिण दिल्ली संसदीय क्षेत्र के नाम से जाना जा रहा है। एक जमाने में कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले इस संसदीय क्षेत्र गत विधानसभा चुनाव में सभी 10 सीटों पर चुनाव हारकर कांग्रेस को जबरदस्त आघात पहुंचा है। 
 
इसकी मुख्य वजह एक यह भी है कि यहां से जाट बाहुल्य इलाका जैसे नजफगढ़ और मटियाला आदि कई विधानसभा क्षेत्र परिसीमन के बाद दक्षिण दिल्ली से कटकर पश्चिमी दिल्ली संसदीय क्षेत्र में मिल गए हैं लेकिन गुर्जर बाहुल्य विधानसभा क्षेत्र दक्षिण दिल्ली में ही है। इसके साथ ही काफी संख्या में झुग्गी-झोंपड़ी कालोनी और अनधिकृत कालोनियां भी इस इलाके से कटकर अन्य संसदीय क्षेत्रों के साथ जुड़ गईं।
 
गत विधानसभा के चुनाव में 10 में से केवल 3 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार दूसरे नम्बर पर रहे जबकि 2 प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। जिन विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के उम्मीदवार अपनी जमानत बचाने में नाकामयाब रहे, उनमें तुगलकाबाद से ओमप्रकाश बिधूड़ी और पालम से पश्चिमी दिल्ली के सांसद महाबल मिश्रा के बेटे विनय मिश्रा शामिल हैं। तुगलकाबाद विधानसभा सीट पर भाजपा के रमेश बिधूड़ी ने अपना कब्जा कायम रखा जबकि पालम सीट पर भी भाजपा का प्रत्याशी विजयी रहा। 
 
दक्षिण दिल्ली के 3 विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लडऩे वाले तीन दिग्गज नेताओं प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष चौ. प्रेम सिंह को अम्बेडकर नगर से, पूर्व अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा को कालकाजी से और दिल्ली विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. योगानंद शास्त्री को महरौली से पराजय का सामना करना पड़ा। चौ. प्रेम सिंह राजधानी में कांग्रेस के एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने अपने जीवन में कभी चुनाव नहीं हारा था। इसलिए उनका नाम गिनीज बुक में दर्ज किया गया था।
 
लेकिन गत विधानसभा चुनाव में वह भी तीसरे स्थान पर पहुंच गए। एक जमाने में बाहरी दिल्ली कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। इस इलाके में कांग्रेस के दिग्गज नेता सज्जन कुमार का कब्जा था। शायद कोई गांव ऐसा होगा जहां सज्जन कुमार का सीधा सम्पर्क नहीं है। गत लोकसभा चुनाव में सिख समुदाय के लोगों द्वारा उन्हें टिकट दिए जाने का कड़ा विरोध किए जाने पर पार्टी ने उनके छोटे भाई रमेश कुमार को प्रत्याशी बनाया था और इस सीट पर कब्जा बरकरार रखा। 
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