वाराणसी : मोदी के कारण हो सकता है मतों का धु्रवीकरण

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Wednesday, March 12, 2014-9:52 PM

वाराणसी: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को उत्तर प्रदेश की वाराणसी लोकसभा सीट से मैदान में उतारने को जितना जरूरी समझ रही है, उतना ही उम्मीदवारी की घोषणा में विलंब करने को मजबूर भी दिख रही है। इस मजबूरी के पीछे वाराणसी के मौजूदा सांसद डॉ. मुरली मनोहर जोशी तो कम से कम नहीं ही हैं, जैसा कि प्रचारित है।

भाजपा ने अपने वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी सहित कई वरिष्ठ नेताओं के खुले विरोध के बावजूद मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था, फिर मोदी की वाराणसी से उम्मीदवारी की राह में जोशी का रोड़ा उसके लिए कितना मायने रखता है, सोचने की बात है। वाराणसी के राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं में जो कारण खास-ए-आम है, वह है मतों के ध्रुवीकरण का। भाजपा इससे डरी हुई है, और वह इस ध्रुवीकरण की पैमाइश में जुटी है कि यह उसके लिए कितना नफा-नुकसान वाला होगा।

भाजपा सूत्रों के अनुसार, पार्टी पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपनी खोई जमीन फिर से हासिल करने के लिए मोदी को उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट से लड़ाना चाहती है। मोदी की वाराणसी से उम्मीदवारी के जरिए बिहार के समीकरण भी साधे जा सकते हैं। लेकिन वाराणसी में मुस्लिम, दलित व पिछड़ी जाति के मतदाताओं का प्रतिशत भाजपा को डरा रहा है।

अकेले मुस्लिम मतदाता ही वाराणसी में 30 प्रतिशत से अधिक हैं। दलित, पिछड़ों को लेकर यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से ऊपर जाता है। यदि आम आदमी पार्टी (आप) के अरविंद केजरीवाल यहां अखाड़े में कूदते हैं तो लड़ाई सीधे मोदी बनाम केजरीवाल हो जाएगी और मतों का ध्रुवीकरण भाजपा की जीत का समीकरण बिगाड़ सकता है।

इस स्थिति को कांग्रेस के लोग भी स्वीकारते हैं। कांग्रेस के एक स्थानीय नेता ने नाम न जाहिर करने के अनुरोध के साथ हालांकि कहा कि वाराणसी के स्थानीय मुद्दे कांग्रेस के पक्ष में हैं, क्योंकि मौजूदा सांसद डॉ. जोशी ने पिछले पांच वर्षों के दौरान कुछ नहीं किया, वैसे भी 2009 का चुनाव वह मुश्किल से जीत पाए थे। लेकिन मोदी और केजरीवाल के आने से स्थिति बदल सकती है और इसमें कांग्रेस को नुकसान हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि 2009 के चुनाव में जोशी मात्र 17,211 मतों से जीते थे। दूसरे स्थान पर बसपा के मुख्तार अंसारी थे। जोशी को 30.52 प्रतिशत, अंसारी को 27.94 प्रतिशत और तीसरे स्थान पर रहे सपा के अजय राय को 18.61 प्रतिशत मत मिले थे। राजनीतिक विश्लेषक, प्रोफेसर आनंद दीपायन का मानना है कि मोदी की चर्चा भले हो, लेकिन उनका मुद्दा वाराणसी की गंगा-जमुनी संस्कृति के ताने-बाने में बहुत फिट नहीं बैठती। चर्चा का उन्हें कितना लाभ होगा, संदेहास्पद है।

उन्होंने कहा, ‘‘वाराणसी की मिश्रित संस्कृति है, यहां हर विचारधारा के लोग रहते हैं। मोदी को लेकर जो चर्चा है, वाराणसी में वोट के लिहाज से वह बहुत ठोस नहीं लगती। यदि कोई धर्मनिरपेक्ष छवि का व्यक्ति ठीक से सामने आया, तो मुझे लगता है मोदी चुनाव हार जाएंगे। केजरीवाल की स्थिति यहां आने के बाद पता चलेगी। यदि वह मजबूती के साथ खुद को पेश कर पाए तो, चुनाव जीत भी सकते हैं।’’

बहरहाल, इस समय देशभर में चर्चा के केंद्र में आई वाराणसी सीट पर किसी भी दल ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। सबकी नजर भाजपा पर है। गुरुवार को नई दिल्ली में भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक होनी है, जहां से कोई घोषणा हो सकती है, और उसके बाद ही वाराणसी की स्थिति साफ हो पाएगी।

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