खुशवंत सिंह को श्रद्धांजलि देने उमड़ पड़ा लोगों का हुजूम

  • खुशवंत सिंह को श्रद्धांजलि देने उमड़ पड़ा लोगों का हुजूम
You Are HereNational
Thursday, March 20, 2014-10:50 PM

नई दिल्ली (अभिषेक आनन्द): जिंदा होते हुए खुशवंत सिंह से मिलना कितना कठिन था यह तो नहीं कह सकते। लेकिन गुरुवार को दुनिया से चले जाने के बाद प्रसिद्ध साहित्यकार के घर में प्रवेश थोड़ा आसान था। हर कोई उनके परिवार को सांत्वना देने और श्रद्धांजलि देने पहुंच रहा था।

यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, भाजपा नेता लालकृष्ण अडवानी, बिसन सिंह बेदी, अभिनेता बिनोद खन्ना और साहित्य, कला, राजनीति, बॉलीवुड की तमाम हस्तियों से लेकर प्रसंशकों का भारी हुजूम घर से लेकर अंतिम संस्कार तक मौजूद था। वीआईपी के आने के चलते सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी थी। बहुत ही भारी मन से लोगों ने विदा तो किया लेकिन वो लोगों के दिलों में और गहरे तौर पर बस गए।


उनके परिवार से मिलने पहुंचे वरिष्ठ पत्रकार और उनके पुराने मित्र कुलदीप नैयर जब सुजान पार्क स्थित उनके आलीशान घर में प्रवेश किया तो परिजन उनसे आत्मीयता से गले लगा लिया और आंसुओं की धारा बह निकली। एक टेबल को घेरे हुए कई सफेद पोशाकों में महिला-पुरुष शांत हो मातम मना रहे थे। उनके बेटे राहुल सिंह और उनकी बेटी मीना सिंह इस घड़ी में लोगों की सांत्वना ग्रहण कर रहे थे। घर के भीतर के कोने से संगीत की ध्वनि बाहर आ रही थी।

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर कहते हैं कि देश में आपातकाल लगाए जाने के दौरान खुशवंत से उनकी असहमति थी, क्योंकि वे ईमर्जेंसी के पक्ष में थे। हालांकि नैयर तारीफ करते हुए कहते हैं कि खुशवंत ने उन्हें जो भी मर्जी हो वह लिखने की छूट दी थी। उन्होंने नैयर को लेखों के लिए अधिक पैसे भी दिए थे ताकि नौकरी जाने पर दिक्कत न हो।


पूर्वजों की थी आधी दिल्ली
कहा जाता है कि इनके पिता शोभा सिंह ब्रिटिश जमाने के बहुत बड़े ठेकेदार थे। खुद खुशवंत सिंह ने इस बात को स्वीकार किया है कि नई दिल्ली को देश की राजधानी बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है। जब ब्रितानी हुकूमत ने देश की रजाधानी को कोलकाता (तब कलकत्ता) से दिल्ली किया तो शिलान्यास का पत्थर किंग्सवे के पास किया गया था।

उस पत्थर पर इस बावत सब उकेर दिया गया था। लेकिन इंग्लैंड से आए एक आर्किटेक्ट ने जब अरावली पहाड़ी के किनारे आज के नई दिल्ली इलाके को देखा तो उसने स्थान बदलने की सिफारिश की। ब्रिटिश हुकूमत ने शिलान्यास के पत्थर को किंग्सवे से नई दिल्ली लाने का ठेका शोभा सिंह को दिया। शर्त यह थी कि स्थानांतरण की इस गतिविधि को कोई न जान सके। इसके लिए उन्हें उस जमाने में 16 रुपये दिए गए थे। खुशवंत सिंह के दादा परदादा आधी दिल्ली के मालिक हुआ करते थे।

उनके पूर्वजों ने कालका शिमला रेल मार्ग का निर्माण, दिल्ली के वायसराय भवन सरीखे साउथ ब्लाक के बहुत सारे भवनों के निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी। कहा जाता है कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के खिलाफ शोभा सिंह ने गवाही दी थी।

विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You