...तो इसलिए नहीं मिला आडवाणी को भोपाल से टिकट

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Friday, March 21, 2014-2:27 PM

भोपाल: भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी के चलते पार्टी के वरिष्ठ नेता और संघ दो दिन तक सिर के बल खड़ा रहा। गुरुवार को आडवाणी के मान जाने के बाद दोनों ने राहत की सांस ली। आडवाणी ने भोपाल छोड़ गांधीनगर से चुनाव लड़ने के लिए हामी भर दी। हालांकि आडवाणी की माराजगी को दूर करने के लिए सुषमा स्वराज, नीतिन गडकरी, उरुण जेटली सहित नरेंद्र मोदी को भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। पर सभी के जेहन में सवाल था कि जब अन्य नेताओं को उनके मनपंसद जगहों से चुनाव लड़ने की अनुमति मिल रही है तो फिर आडवाणी को भोपाल से टिकट देने में भाजपा ने इतनी अनाकनी क्यों की और पूरी पार्टी बेचैन क्यों थी?

 

पार्टी और संघ सूत्रों के अनुसार पार्टी इसलिए चिंतित थी क्योंकि  इससे पार्टी में मोदी विरोधी 'मध्य प्रदेश मोर्चा' बनने की आशंका थी। भोपाल से आडवाणी के चुनाव जीतने के बाद पार्टी में मोदी विरोधी गुट के और मजबूत होने की संभावना थी और इस गुट के केंद्र में आडवाणी और पीछे शिवराज सिंह चौहान हो सकते थे क्योंकि आडवाणी कई बार अपने बयानों में चौहान को मोदी के समकक्ष 'विकास पुरुष' के रूप में पेश कर चुके हैं।

 

इसके अलावा सुषमा स्वराज भी मध्य प्रदेश के विदिशा से चुनाव लड़ रही हैं और उन्हें भी  मोदी विरोधी समझा जाता है। ऐसे में पार्टी को आशंका थी कि आडवाणी, चौहान और सुषमा  'त्रिमूर्ति' से समस्या खड़ी हो सकती थी इसलिए ये गठ न बने सके इसे पहले तोड़ना जरूरी था और इसी के तहत आडवाणी को भोपाल सीट से पार्टी टिकट देने से कतरा रही थी।

 

एक अन्य कारण ये भी था कि गुजरात से आडवाणी के चले जाने से विरोधी पार्टियों को मोदी पर हमला करने का एक और हथियार मिल जाता और आडवाणी अगर भोपाल से चुनाव लड़ते तो वे गुजरात के विकास की तुलना  मध्य प्रदेश से भी करते और इससे पार्टी के लिए अजीब स्थिति पैदा हो जाती। बस इन्हीं कारणों पर पार्टी नेता आडवाणी को गांधीनगर से चुनाव लड़ने पर मनाने की जद्दोजहद कर रहे थे।

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