... तो इन चिडिय़ों ने भायी दूनघाटी

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Saturday, March 22, 2014-1:20 PM

देहरादून: उत्तराखंड प्रकृति के साथ-साथ पक्षियों का भी अनोखा भंडार है। यहां उन पक्षियों की बहुतायत है जो अन्य स्थानों पर विलुप्तप्राय हैं। पक्षी विशेषज्ञों के प्रयासों तथा पर्यावरण में बदलाव से नन्ही मुनिया पूरी एक शताब्दी बाद फिर उत्तराखंड पहुंच गई हैं।

मुनिया प्रजाति की व्हाइट रम्प्ड मुनिया चिडिय़ा और बुलबुल प्रजाति की रैड व्हिस्की रैड बुलबुल की उत्तराखंड में उपस्थिति के प्रमाण मिले हैं। ग्राफिक एरा पर्वतीय विश्वविद्यालय के शिक्षक डा. कमलकांत जोशी को अपनी शोध परियोजना के दौरान इन दोनों प्रजातियों की चिडिय़ाओं की दूनघाटी में उपस्थिति के प्रमाण मिले हैं। इनमें एक चिडिय़ा चमोली जनपद के कई इलाकों में पाई गई है।


ग्राफिक एरा पर्वतीय विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के असिस्टैंट प्रोफैसर डा. कमलकांत जोशी ने बताया कि मुनिया प्रजाति की व्हाइट रम्प्ड मुनिया को वर्ष 1900 में प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी वाल्टन ने कुमाऊं क्षेत्र में देखा था। मूलत: दक्षिण भारत की यह छोटी चिडिय़ा देहरादून और नारायण बगड़, थराली और कर्णप्रयाग क्षेत्र में पाई गई है। डा. जोशी ने अपनी रिपोर्ट में मुनिया प्रजाति की इस विशेष प्रकार लगभग 45 चिडिय़ां इन क्षेत्रों में देखने का दावा किया है।

इसके अतिरिक्त बुलबुल प्रजाति की रैड व्हिस्की रैड बुलबुल की दून घाटी में उपस्थिति दर्ज हुई है। इस शोध परियोजना के दौरान डा. जोशी ने दून घाटी में जनवरी और मार्च माह में इस तरह की 10 बुलबुल देखी हैं।

उत्तराखंड के इन क्षेत्रों में मुनिया और बुलबुल की इन प्रजातियों ने एक बार फिर प्रवास शुरू कर दिया है। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की पक्षी विविधता एवं पक्षी संवाद प्रयोगशाला के प्रमुख व पक्षी वैज्ञानिक डा. दिनेश भट्ट ने व्हाइट रम्प्ड मुनिया चिडिय़ा और बुलबुल प्रजाति की रैड व्हिस्की रैड बुलबुल दूनघाटी और चमोली जनपद में मिलने के डा. जोशी के दावे को प्रामाणिक करार दिया है।

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