गंगा-जमुनी तहजीब की एक मिसाल

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Tuesday, March 25, 2014-1:19 PM

 नई दिल्ली : दिल्ली का दिल माने जाने वाला चांदनी चौक हिन्दुस्तान की गंगा-जमुनी तहजीब की एक मिसाल है। यह एक ऐसा स्थान है जहां सभी धर्मों का संगम है। यहां एक ओर ऐतिहासिक गौरी शंकर मंदिर है, तो उसके सामने बैपटिस्ट चर्च है। उसके कुछ ही कदम की दूरी पर गुरुद्वारा शीशगंज है, तो कुछ दूरी पर ऐतिहासिक फतेहपुरी मस्जिद। आजादी के आंदोलन का गवाह रहा टाऊन हाल का चौराहा है और उसके पास भाई मतिदास चौक शहीदी का गवाह रहा फव्वारा है। यानी हर धर्म का मानने वाला व्यक्ति यहां आकर शीश झुकाता है।

सुबह-शाम मंदिर में बजने वाले घंटे की ध्वनि, तो पास ही मस्जिद में 5 बार होने वाली नमाज और चर्च में होने वाली प्रार्थना तथा गुरुद्वारे में दिनभर चलने वाला सबद-कीर्तन और अरदास की आवाज इस इलाके में आने वाले हर व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करती है।  

आज की युवा पीढ़ी के बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि 1942 में आजादी के आंदोलन की अलख इसी चांदनी चौक में प्रज्वलित हुई थी। आजादी के मतवालों पर फिरंगियों द्वारा गोलियां बरसाने का आदेश दिया गया था। उस दौरान काफी लोगों ने ऐतिहासिक शीशगंज गुरुद्वारे में पनाह लेकर कई दिनों तक अपना आशियाना बनाया था, उनमें केवल हिन्दू या सिख नहीं बल्कि सभी धर्मों के वे लोग शामिल थे, जो अपने देश को आजाद कराने के लिए मर-मिटने का जज्बा रखते थे। 

अंग्रेजो भारत छोड़ो का नारा बुलंद करने वालों ने एक ट्राम को इसी चांदनी चौक में आग के हवाले कर दिया था। उसके बाद दिल्ली में 9 दिनों तक मार्शल-लॉ लागू कर दिया गया था। उस दौरान लोग अपने घरों में ही कैद रहे थे। इतिहास गवाह है कि उसके बाद चांदनी चौक स्थित कोतवाली थाने में आजादी की मशाल जलाने वाले 9 क्रांतिकारियों के खिलाफ दिल्ली में पहली एफ.आई.आर. दर्ज की गई थी। 

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