उमा के पीछे अब भी पड़े हैं MP के भाजपा नेता!

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Thursday, March 27, 2014-7:58 PM

भोपाल: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मुखर नेता उमा भारती की भले ही अपने गृह राज्य मध्य प्रदेश की राजनीति से दूरी बढ़ गई हो, मगर राज्य के पार्टी नेताओं ने उनके खिलाफ  चलाए जाने वाले अभियान को खत्म नहीं किया है।
 
उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा ने 2003 में सत्ता हासिल की थी और उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री भी बनाया, मगर परिस्थितियां बदलते देर नहीं लगी। उमा भारती बमुश्किल एक साल ही राज्य की मुख्यमंत्री रह पाईं, उसके बाद तो उनका भाजपा से ही नाता टूट गया।

भाजपा से नाता टूटने के बाद उमा भारती ने अलग दल बनाया और फिर उनकी शर्तों के साथ भाजपा में वापसी हुई। उन्हें न चाहते हुए उत्तर प्रदेश के चरखारी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लडऩा पड़ा। अब भाजपा ने झांसी संसदीय क्षेत्र से उन्हें उम्मीदवार बनाया है।

उमा चुनाव के लिए झांसी से सक्रिय होतीं कि इससे पहले ही उनके भोपाल से चुनाव लडऩे की खबरें चर्चाओं में आ गईं। मीडिया के जरिए जब क्षेत्र बदलने की बात उमा तक पहुंची तो उन्हें खुद इसकी सफाई देने सामने आना पड़ा।

उमा भारती भी जान गई हैं कि उनके खिलाफ  मध्य प्रदेश के कुछ नेता इस तरह की चर्चाओं को हवा दे रहे हैं। बुधवार को उन्होंने ग्वालियर में यहां तक कह दिया कि एक बड़े नेता ने यह बात प्रचारित की है कि ‘‘मैं भेापाल से चुनाव लडऩा चाहती हूं।’’ शिवराज सिंह चौहान को इस बात की जांच करानी चाहिए कि वह नेता कौन है।

उनका कहना है कि झांसी के चुनाव में तो वे समाजवादी पार्टी (सपा) से लड़ लेंगी, मगर अपनी पार्टी के नेताओं का क्या करें। भाजपा नेताओं के इस कृत्य से वे अपने को डरा हुआ भी महसूस नहीं करतीं।

उमा भारती के साथ यह पहली बार ऐसा नहीं हुआ है जब उन्हीं के दल के लोगों ने उनके खिलाफ  खबरें छपवाई हों, इससे पहले भी पार्टी के नेता ‘ऑफ  द रिकार्ड’ उनके खिलाफ  खबरें लीक करते रहे हैं। इस बात को भी उन्होंने पार्टी के भीतर उठाया था। तब उन नेताओं का कुछ नहीं हुआ जो ऐसा करते थे, उल्टे उमा भारती के खिलाफ  ही रची गई योजना सफल रही थी।

राजनीति के जानकार कहते हैं कि मध्य प्रदेश के कई नेता ऐसे हैं, जिन्हें हमेशा इस बात का डर सताए रहता है कि कहीं फिर उमा भारती की सक्रियता राज्य में न बढ़ जाए। वे जानते हैं कि अगर ऐसा हो गया तो उनके भविष्य पर संकट मंडराने लगेगा, क्योंकि उनकी गिनती उमा विरोधियों में होती है।

कहते हैं कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होता, मगर उमा भारती के साथ ऐसा नहीं हो रहा है। सक्रिय राजनीति के मामले में भले ही उनका अपना गृह राज्य छूट गया हो, मगर पार्टी के भीतर दुश्मन अभी भी बने हुए हैं।

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