क्या मोदी दोहरा पाएंगे वाजपेयी का फार्मूला?

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Sunday, March 30, 2014-12:24 AM

नई दिल्ली: लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी से पार्टीजन काफी उम्मीदें लगाए बैठे हैं। सूत्रों के अनुसार भाजपा को उम्मीद है कि चुनावों के बाद मोदी अपने प्रभाव और अनुभव से अन्य दलों को राजग में शामिल करवाकर केन्द्र में सरकार बनाने में कामयाब हो जाएंगे।

प्रश्र यह उठता है कि क्या मोदी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह काम करेंगे और चुनाव के बाद की स्थिति में राजग परिवार में और सहयोगी दलों को लाने में कामयाब होंगे। यू.पी.ए. की गुडविल पूरी तरह धराशायी हो गई हैं और भाजपा की लोकप्रियता बढ़ गई है जिसके परिणामस्वरूप कुछ महत्वपूर्ण छोटी पार्टियां पहले ही भाजपा का दामन थाम चुकी हैं। यह प्रश्र भी महत्वपूर्ण है कि क्या मोदी पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के फार्मूले को दोहराने में सफल होंगे या नहीं। (सहयोगी दलों की संख्या को लेकर) यह सब कुछ भाजपा द्वारा लोकसभा चुनावों में प्राप्त की जाने वाली सीटों की संख्या पर निर्भर करेगा।

इसके साथ ही अगली संसद में सांसदों के अंक गणित को भी देखना पड़ेगा। मोदीनीत शासन का कोई विकल्प दिखाई न देने पर निश्चित रूप से कुछ क्षेत्रीय पार्टियों को साथ लिया जाएगा जो अभी तक राजग से बाहर हैं। जैसे बीजद और अन्ना द्रमुक। इन दोनों के ‘लेन-देन’ की काफी गुंजाइश है। ये पार्टियां केन्द्र से लाभ उठाने, अपने हितों को साधने के लिए सरकार में शामिल होने या बाहर से समर्थन देने पर राजी हो सकती हैं। यह समर्थन सत्र दर सत्र के आधार पर हो सकता है। यह प्रक्रिया इस बात को यकीनी बनाएगी कि अल्पसंख्यक सरकार संसद में धराशायी नहीं होगी।

1996 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के 3 सहयोगी थे और उनकी सरकार 13 दिन तक चली। 1998 में जब यह स्पष्ट हो गया कि और अन्य विकल्प दिखाई नहीं दे रहा तो भाजपानीत राजग के 22 सहयोगी बन गए और 1999 में यह संख्या बढ़कर 26 हो गई। सरकार बनाने की समूची प्रक्रिया उन क्षेत्रीय पार्टियों की सहमति से की गई जिन्होंने राजग में शामिल होने का फैसला किया था। सरकार में वयोवृद्ध नेता जार्ज फर्नांडीज का भी सहयोग लिया गया जिन्होंने सोशलिस्ट ब्लाक कांगे्स वाद विरोधी काम किया। उन्होंने भाजपा को स्वीकार्य बनाने के लिए अपनी छवि का भी इस्तेमाल किया। क्षेत्रीय पार्टियों ने सांझा न्यूनतम कार्यक्रम तैयार किया। अभी तक ऐसी कोई प्रक्रिया शुरू नहीं हुई और उम्मीद है कि 16 मई को नतीजों के बाद क्षेत्रीय पार्टियां अपने हितों के व्यावहारिक आकलन के आधार पर राजग से जुड़ेंगी।

अगर मोदी अपने मकसद में सफल हो जाते हैं तो यह खुद भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण यात्रा होगी। लोगों को 15 वर्ष पूर्व स्वीकार्य प्रधानमंत्री (वाजपेयी) के रूप में मौजूदा प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में नया चेहरा मिलेगा। वाजपेयी मूल रूप से उदारवादी थे। वे भाजपा के भीतर ही सहयोगियों को लेन-देन के लिए इस्तेमाल करते रहे। मोदी के मामले में ऐसी स्थिति नहीं हो सकती। वे उन सहयोगियों को साथ लेने की कोशिश करेंगे जो संघीयवाद कार्ड का इस्तेमाल करते हैं। जो राज्यों को पैकेज की पेशकश भी कर सकतेहैं। मोदी की स्थिति के बारे में सबसे महत्वपूर्ण विभिन्नता यह है कि उनके बारे में कोई भी व्यक्ति भविष्यवाणी कर सकता है।

भाजपा में एक छोटा ग्रुप होगा जो मोदी के मकसद को तारपीड़ो करने के इंतजार में होगा। 86 वर्षीय वयोवृद्ध एल.के. अडवानी को सीट आबंटन इस बात का स्पष्ट संकेत है। इसके साथ ही कुछ नेताओं को मोदी से समस्या भी है। अगर मोदी को चुनावों में पर्याप्त संख्या में सांसदों का समर्थन न मिला तो यह ग्रुप निश्चय ही पार्टी और संघ परिवार पर हावी हो सकता है। सूत्रों का कहना है कि अगर भाजपा के सदस्यों की संख्या 160 से कम हुई तो आर.एस.एस. के भीतर जोरदार दलील दी जाएगी कि मोदी के प्रोजैक्ट को बंद किया जाए।

वाजपेयी को भी आर.एस.एस. के भीतर और भाजपा के छोटे गुट की तरफ से निरंतर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मगर वाजपेयी संसद के अनुभवी नेता थे। उनके सभी राजनीतिक पार्टियों के साथ निजी संबंध थे जिसकी बदौलत वह अपना कार्यकाल पूरा कर पाए। 16 वर्ष बाद भाजपा के कई मुख्यमंत्रियों ने यह साबित किया है कि उनकी प्रशासन पर अच्छी पकड़ है। मोदी को वाजपेयी ने 2004 में राजग की हार के लिए एक महत्वपूर्ण कारण बताया था। मोदी को कार्पोरेट सैक्टर की ओर से काफी समर्थन है।

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