इस ‘लहर’ पर किसी लहर का असर नहीं!

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Thursday, April 03, 2014-12:54 AM

नई दिल्ली: पूर्वी उत्तर प्रदेश में योगी आदित्य नाथ का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उनके बारे में कहा जाता है कि अपनी धार्मिक और समाजसेवी गतिविधियों के कारण जनमानस में पहचान रखने वाला यह शख्स भाजपा से नहीं बल्कि इस क्षेत्र में भाजपा इनकी वजह से अपना वजूद बनाए हुए है। देश में लहर किसी भी राजनीतिक दल की हो, इनकी लहर के आगे कोई नहीं टिक पाता भले ही वह नरेंद्र मोदी ही क्यों न हों।

योगी आदित्य नाथ 26 साल की उम्र से इस क्षेत्र से सांसद बनते आ रहे हैं। कट्टर हिंदूवादी व्यक्तित्व का लिबास ओढ़े आदित्य नाथ ने पहली बार सन् 1998 में भाजपा के टिकट पर गोरखपुर से चुनाव लड़ा और सांसद बने। तब से आज तक वह भाजपा का यहां से प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं। नाथ संप्रदाय से आने वाले योगी आदित्य नाथ गोरखपुर में बने एक विशालकाय मंदिर के महंत भी हैं। औसत कद, कानों में ट्रांसपेरैंट प्लास्टिक के कुंडल, गेरुए वस्त्र, पैरों में मोजे और माथे पर सिंदूरी तिलक, ये इनकी पहचान बताने के लिए काफी हैं। आधुनिक चकाचौंध से कोसों दूर भाजपा के इस सांसद के पास बड़े-बड़े लोग भी दरवाजे के बाहर जूते उतारकर उनसे मिलने पहुंचते हैं।

 पूर्वी उत्तर प्रदेश में भाजपा की ओर से समन्वयक का जिम्मा लिए योगी आदित्य नाथ गोरखपुर में सन् 2007 में हुए सांप्रदायिक दंगों के मुख्य जिम्मेदार ठहराए जाते हैं। हाल ही में लोकनीति और सी.एस.डी.एस. की चुनावी सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि जब पूरे देश में नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा चुनाव लड़ रही है तो पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस पिछड़े क्षेत्र गोरखपुर में योगी आदित्य नाथ को लेकर तमाम तरह की अटकलें हैं। विकास से कोसों दूर गोरखपुर में कई वर्षों में जापानी बुखार ने हजारों लोगों को लील लिया है। उसकी रोकथाम के लिए चलाए गए या चलाए जा रहे तमाम अभियान नाकाफी साबित हुए हैं। लोगों के लिए शौचालय नहीं हैं, वे खुले में शौच करने को विवश हैं। ऐसे में विकास के नाम पर भाजपा चुनाव लड़ रही है।

 नेपाल सीमा से सटे गोरखपुर के इस क्षेत्र में बेहद उदासीन भरा मंजर दिखाई पड़ता है। यहां की ऊंची जातियां गुमनाम होकर ‘कट्टर हिंदुत्व’ में तबदील हो गई हैं। योगी को कट्टर हिंदूवादी चेहरा माना जाता है। उनके चुनाव प्रचारों में अभी तक हिंदू-मुस्लिम की ही बात होती रही है। ऐसे में विकास की बात को छेडऩे पर एक ‘अप्रत्यक्ष झिझक’ को महसूस कर सकता है तो वह है यहां का मतदाता।   

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