नया नहीं है धर्मगुरुओं के वोटों का धंधा!

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Saturday, April 05, 2014-12:38 PM

नई दिल्ली: अभी तक समाजवादी पार्टी (सपा) का दामन थामने वाले  दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैय्यद अहमद बुखारी ने पार्टी पर मुसलमानों के साथ वादा खिलाफी और मुजफ्फरपुर दंगों के दौरान उन्हें संरक्षण नहीं देने पर आम चुनावों में कांग्रेस को समर्थन देने की घोषणा की तो  तो केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा, देर आए, दुरुस्त आए। तो दूसरी तरफ मौलाना बुखारी की अपील के बाद भाजपा ने बुखारी पर निशाना साधते हुए कहा कि  वह बुखारी के मशविरे पर भरोसा नहीं करेंगे। वे कभी किसी दल के समर्थन की बात करते हैं तो कभी किसी। हैरानी वाली बात यह है कि राजनीति में धर्मगुरुओं का प्रयोग नया नहीं है। मौजूदा चुनावों में कई धार्मिक शख्सियतें विभिन्न दलों के प्रचार करने में जुटी हुई है। 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी के समर्थन की घोषणा की थी। जिसके बाद सपा यूपी में जीत हासिल करने में कामयाब हुई थी। लेकिन उसी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े उनके दामाद जमानत भी नहीं बचा पाए थे।

 गौरतलब है बुखारी ने आगामी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को समर्थन देने की घोषणा कर दी है। बुखारी की बुधवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से हुई मुलाकात के बाद यह लगभग तय हो गया था कि शाही इमाम समाजवादी पार्टी का साथ छोडऩे जा रहे हैं। बुखारी ने यहां संवाददाताओं से बातचीत के दौरान कहा कि इन चुनावों की महत्ता को देखते हुए हमें सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ एकजुट होना पड़ेगा। बुखारी ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को भी अपना निशाना बनाया और कहा कि बसपा उन्हें इस बात की तसल्ली नहीं दे पायी कि वह चुनाव बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल नही होगी। उन्होंने बहुत तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था बसपा को वोट देना वोट खराब करना है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि वह बिहार में लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को अपना समर्थन देंगे। सोनिया गांधी से अपनी मुलाकात के बारे में मौलाना बुखारी ने कहा हमनें कांग्रेस अध्यक्ष  के साथ 2014 के चुनाव के संबंध में विचार विमर्श किया मैं कांग्रेस को इस उम्मीद के साथ समर्थन देने की घोषणा करता हूं, यदि वह सत्ता में आती है तो अपने वादों को पूरा करेगी।
 

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