भर्ती घोटाले में साथ न देने की मिल रही सजा, सत्याग्रह करने वाले 'जज' का खुलासा

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Thursday, August 03, 2017-5:03 PM

जबलपुरः मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के न्यायिक इतिहास में पहली बार धरने पर बैठे जज ने अपने सीनियर्स पर गंभीर आरोप लगाए है। हाईकोर्ट के गेट के बाहर धरने पर बैठ विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी तथा अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश आरके श्रीवास ने दूसरे दिन भी 6.30 घंटे तक सत्याग्रह किया। गुरूवार को धरने के आखिरी दिन उन्होंने कहा कि यदि इसके बाद भी इंसाफ नहीं मिला तो वे भूख हड़ताल करेंगे। सत्याग्रह स्थल पर बड़ा खुलासा करते हुए आरोप लगाए कि फोर्थ क्लास भर्ती घोटाले में साथ नहीं देने के कारण ही उन्हें महज 15 माह में चौथे तबादले जैसी कठोर सजा दी गई है।

एडीजे श्रीवास ने बाकायदा दस्तावेजों का दिखाते हुए साफ किया कि नवंबर-2016 में न्यायालयीय स्तर पर चतुर्थ श्रेणी कर्मियों की भर्ती प्रक्रिया आयोजित की गई। इसके लिए गठित बोर्ड में उन्हें एक सदस्य बनाया गया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने उन्हें हिदायत दी थी कि जो भी आवेदक साक्षात्कार देने आएं, उनमें से किसी को 6 से अधिक अंक मत देना।

ऐसा इसलिए क्योंकि जिनकी नियुक्ति करनी है, वो हम अपने स्तर पर कर देंगे। चूंकि इस हिदायत के बावजूद बोर्ड मेम्बर होने के नाते मैंने ईमानदारी से कुछ आवेदकों को उनकी पात्रता के अनुरूप यथोचित अंक दे दिए, इसीलिए उनके प्रति दुर्भावना बरती जाने लगी। यदि मेरे द्वारा लगाए गए सभी आरोपों की उच्चस्तरीय जांच करवाई जाए, तो स्वत: दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

पिछले तीन से कर रहे परेशान 

एडीजे श्रीवास ने बताया कि 2014 में जब वे धार में पदस्थ थे, तब एक गोपनीय शिकायत के आधार पर उनके खिलाफ जांच शुरू कर दी गई थी। सवाल उठता है कि जब वह शिकायत बाकायदे शपथपत्र पर नहीं की गई थी, तो उस पर भरोसा करते हुए जांच क्यों शुरू की गई?

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 3 अक्टूबर 2014 के अलावा 20 नवंबर 2014 के अन्य न्यायिक परिपत्र का उल्लंघन करते हुए अपनाया गया, अत: इंसाफ अपेक्षित है। इन परिपत्रों में व्यवस्था दी गई है कि किसी भी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ जब तक शपथपत्र पर शिकायत न प्रस्तुत की जाए, उसे जांच में न लिया जाए। इसके बावजूद ऐसा किया गया।

एडीजे श्रीवास ने सवाल उठाया कि क्या सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के विपरीत बिना शपथपत्र वाली शिकायत के आधार पर संज्ञान लेकर उनके खिलाफ 2014 से शुरू की गई जांच उचित है? क्या ऐसी शिकायतों के आधार पर जारी नोटिस का जवाब उनके लिए बंधनकारी है? इस संबंध में पहले पत्र और उसके बाद रिमाइंडर पर रिमाइंडर देने के 18 माह बाद नोटशीट खोली गई और नतीजे बतौर मुझे बिना सुने एकपक्षीय तरीके से चेतावनी देकर फाइल बंद कर दी गई। क्या यही इंसाफ है?

सजा के रूप सिहोरा किया ट्रांसफर 

एडीजे श्रीवास ने दर्द बयां करते हुए बताया कि हाईकोर्ट की ट्रांसफर पॉलिसी के विपरीत हुए तबादले का विरोध करने का खामियाजा यह भुगतना पड़ा कि मुझे दंड बतौर काफी कम समय में शहडोल से सिहोरा ट्रांसफर कर दिया गया। वहां मुझे कोई सुविधा नहीं दी गई। इस प्रताड़ना के खिलाफ मुख्य न्यायाधीश से शिकायत की गई। जब कोई हल नहीं निकला तो फिर से शिकायत की गई। इसके बाद मुझे प्रताड़ित करते हुए काफी कम समय में सिहोरा से जबलपुर ट्रांसफर कर दिया गया।

डीजे ने बुलाकर मेरी रिकॉर्डिंग की

एडीजे श्रीवास ने आरोप लगाया कि 21 फरवरी 2017 को डीजे केके त्रिपाठी ने मुझे मेरी समस्या सुनने की आड़ में अपने चेम्बर में बुलाया। इस दौरान गुप्त रूप से मेरी रिकॉर्डिंग की गई। इसके बाद 31 मार्च 2017 को तत्कालीन रजिस्ट्रार जनरल मनोहर ममतानी ने मुझे शोकॉज नोटिस जारी कर दिया। जिसमें कहा गया कि क्यों न अनुशासनहीनता के एवज में मेरे खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जाए? मैंने इसका अपने स्तर पर संतोषजनक जवाब प्रस्तुत कर दिया। 


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