गुजरात चुनाव-56 इंच नहीं, परियोजनाओं के लॉलीपॉप के भरोसे बीजेपी

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Monday, October 23, 2017-2:09 PM

नेशनल डेस्क: गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए हर पार्टी का अपना चश्मा है। पीएम लाख सबका साथ सबका विकास की बात करें पर सच्चाई यही है कि गुजरात की राजनीति अभी भी जातिवाद की धुरी के इर्द गिर्द ही करवट ले रही है। गुजरात में पटेल, दलित, ओबीसी को साधने की मुहिम शुरू है, जो जातिवाद का ताजा उदारहरण है। 56 इंच के सीने वाले प्रधानमंत्री मोदी  के सामने इस बार चुनाव में जो चुनौतियां हैं उस पर बहस अब लाजिमी हो गया है। बीते 25 वर्ष से लगातार ये चुनाव उनकी अगुवाई में हो रहे थे, लेकिन मोदी के सीएम से पीएम बनने के बाद गुजरात की राजनीति में कई उतार चढ़ाव बीजेपी को देखने को मिले। हम कुछ बातों के जरीए इस उतार चढ़ाव को और तार्किक बना सकते हैं।

1- नरेंद्र मोदी की गैर-मौजूदगी
वर्ष 2001 में बीजेपी ने केशुभाई पटेल को हटाकर नरेंद्र मोदी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया। इसके बाद हर बार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया। इस साल राज्य सभा सांसद बनने से पहले तक 1997 से 2012 के बीच हुए चुनावों में विधायक बन कर अमित शाह मोदी के साथ बने रहे। अब मोदी और शाह दोनों के राष्ट्रीय राजनीति में आने के बाद गुजरात में पहली बार विधान सभा चुनाव हो रहे हैं। तत्कालीन समय में मोदी केवल कांग्रेस से लोहा लेते थे। अब कांग्रेस, आप, अल्पेश, हार्दिक और जिग्रेश जैसे स्थानीय कद्दावर नेताओं से उन्हें तगड़ी चुनौती मिल रही है।

2-सीटें घटने का सिलसिला
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस चुनाव में 150 सीटें जीतने का गणित तैयार किया है, लेकिन वो एक और गणित भूल गए। 2002 से लेकर 2012 तक के चुनाव परिणाम बता रहे हैं की हर बार बीजेपी की सीट कम हुई है। साल 2002 में बीजेपी ने 127 सीटें, साल 2007 में 117 सीटें और साल 2012 में 116 सीटें जीती थीं।

3-महिला शक्ति पर नहीं भरोसा
नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद सबकी उत्सुकता थी की गुजरात को कौन संभालेगा। आनंदीबेन पटेल को पार्टी ने राज्य का सीएम बनाकर तमाम अटलकों पर विराम लगा दिया गया है। झटका तो तब लगा जब बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाले पीएम की स्वीकृति से ही आनंदीबेन का कार्यकाल पूरा होता इससे पहले ही उनकी जगह विजय रूपानी को सीएम बना दिया गया। मोदी शाह के गुजरात से जाने के बाद सबसे बढ़ा उलट फेर के रूप में देखा गया।

4- असंतुष्टों को मनाना
गुजरात में पाटीदार बीजेपी से काफी खफा हैं। गोधरा कांड, उना दलित कांड और पाटीदार आंदोलन के कारण गुजरात की राजनीति विवादों में रही। मोदी के पीएम बनने के बाद गुजरात मुस्लिम मुद्दों से ज्यादा दलितों और पाटीदारों के आंदोलन की वजह से चर्चा में रहा। उना में दलितों की पिटायी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद राज्य भर में दलितों ने बीजेपी सरकार के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किया। गुजरात के दलित पिछले दो दशकों से बड़े पैमाने पर बीजेपी को वोट देते आ रहे थे। लेकिन इस बार बीजेपी को दलित वोटों की चिंता सता रही है। शायद यही वजह है कि अमित शाह ने गुजरात के दलित बीजेपी कार्यकर्ता के घर खाना खाकर अपनी अखिल भारतीय यात्रा की शुरूआत की थी।

5- कौन है वोट बैंक
गुजरात का पाटीदार (पटेल) समुदाय दो दशकों से बीजेपी का पक्का वोटर था। हार्दिक पटेल के नेतृत्व में साल 2015 में पाटीदारों ने आरक्षण के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। हार्दिक पटेल की रैली में लाखों लोग शामिल होने लगे। इस आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया था। आदोलन की उग्रता को देखकर पीएम मोदी को शांति-व्यवस्था की अपील करनी पड़ी थी। राज्य में पटेल सीएम और मंत्रिमंडल कई अहम पदों पर पटेलों के होने के बावजूद बीजेपी सरकार के खिलाफ हुए आंदोलन से इस चर्चा को बल मिला की बीजेपी के वफादार वोटर माने जाने वाले पटेल उससे दूर भी जा सकते हैं। हार्दिक पटेल अभी भी बीजेपी के खिलाफ काफी सक्रिय हैं। मुसलमान, दलित और पटेल वोटर अगर सचमुत बीजेपी के खिलाफ एकजुट हो गये तो पार्टी को आगामी चुनाव में बड़ी मुश्किल हो सकती है।

6- विकास बौरा गया है हुआ वायरल
पिछले एक दशक से गुजरात मॉडल का बीजेपी पूरे देश में उदाहरण के तौर पर पेश करती रही है। साल 2014 के लोक सभा चुनाव से पहले भी बीजेपी और तब उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी गुजरात को मॉडल स्टेट बताकर पूरे देश को वैसा ही बनाने का वादा करते रहे। लेकिन इस बार विधान सभा चुनाव से ठीक पहले सोशल मीडिया पर विकास बौरा हो गया है वायरल हो गया। अमित शाह तक को बीजेपी समर्थकों से अपील करनी पड़ी कि वो सोशल मीडिया पर चल रहे ऐसी चीजों से बचें।

7-अमित शाह के बेटे पर आरोप
कांग्रेसी नेता कपिल सिब्ब्ल का आरोप है कि अमित शाह के बेटे जयशाह की कंपनी टेम्पल इंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड मार्च 2013 में घाटे में थी, ये घाटा 6,239 रुपए था। मार्च 2014 में भी कंपनी घाटे में रही और घाटा था 1,724 रुपए। लेकिन 2014-15 में ये कंपनी मुनाफे में आ गई। यानि मई 2014 में कुछ बदलाव हुआ और मुनाफे का कारवां चल पड़ा। मुनाफा था 18,728 रुपए और कंपनी का कुल राजस्व था सिर्फ 50,000 रुपए। लेकिन असल बदलाव 2015-16 में हुआ, जब कंपनी का टर्नओवर 80 करोड़ हो गया। एक साल में टर्नओवर में ये बढ़ोतरी 16,000 गुना रही। इसके साथ ही कपिल सिब्बल ने अमित शाह के बेटे की दूसरी कंपनी कुसुम फिनसर्व को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए. इस कंपनी में जय अमितभाई शाह का शेयर 60 फीसदी है। पार्टी पर गुजराती मूल के कारोबारियों को विशेष लाभ पहुंचाने के आरोप इन तीन सालों में लगते रहे हैं। माना जा रहा है कि जीएसटी से भी गुजरात का व्यापारी वर्ग नाराज है इसलिए पिछले हफ्ते बीजेपी ने इसमें सशोधन भी किए। इसका असर गुजरात विधान सभा चुनाव पड़ सकता है।

8- आम आदमी पार्टी की भूमिका
गुजरात चुनाव में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच माना जा रहा था। अब इस लड़ाई हार्दिक, अल्पेश, जिग्रेश के साथ आम आदमी पार्टी भी शामिल हो गई है। इस बात को नजरंदाज करना बीजेपी के लिए शायद मुश्किल है। आम आदमी पार्टी भी राज्य में पहली बार चुनाव लड़ेगी। पार्टी ने गोपाल राय को प्रदेश प्रभारी बनाया है। आम आदमी पार्टी ने जिस तरह दिल्ली में साल 2015 में बीजेपी और कांग्रेस को अकेले चित कर दिया उसके बाद से ही अप्रत्याशित नतीजे देने की उसकी क्षमता को लेकर सभी सशंकित रहते हैं। पंजाब विधान सभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी ने 20 सीटों पर जीत हासिल की। पंजाब में सत्ता से बेदखल हुई अकाली दल से भी ज्यादा सीटें आप ने हासिल कीं। बीजेपी और कांग्रेस इस बात को लेकर शायद ही आश्वस्त हों कि आप गुजरात में दिल्ली या पंजाब वाली कहानी दोहरा न दे। 

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