वर्ष 1991 में वित्त मंत्रालय ‘‘कांटों का ताज’’ था: चिदम्बरम

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Sunday, November 20, 2016-7:57 PM

मुम्बई: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने आज कहा कि 1991 में नरसिंह राव की कैबिनेट से प्रणब मुखर्जी को बाहर रखने से हर कोई आश्चर्यचकित था और उस वक्त ‘‘मुख्य धारा’’ के अन्य नेताओं ने वित्त मंत्रालय को ‘‘कांटों का ताज’’ समझकर लेने से इंकार कर दिया होगा। टाटा लिटरेचर लाइव कार्यक्रम में नरसिंह राव भूले बिसरे नायक पर पैनल चर्चा के दौरान चिदंबरम ने कहा कि मैं मुखर्जी के साथ बैठा था और उन्हें विश्वास था कि कैबिनेट में उन्हें जगह मिलेगी चाहे वित्त या विदेश मंत्रालय मिले। जब कैबिनेट की घोषणा हुई तो हम आश्चर्यचकित रह गए कि मुखर्जी का नाम उसमें नहीं था। 

उन्होंने कहा कि राव और मुखर्जी इंदिरा गांधी के समय से ही एक-दूसरे के काफी नजदीक थे। उन्होंने कहा कि मुखर्जी के नाम पर विचार नहीं किए जाने के बाद वित्त मंत्रालय के लिए किसी दूसरे वरिष्ट कांग्रेसी नेता के नाम पर विचार नहीं हो सकता था जिससे बाहर से किसी के आने का रास्ता साफ हो गया। उन्होंने कहा कि इसलिए हम आश्चर्यचकित थे कि उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह का नाम चुना लेकिन पार्टी आश्चर्यचकित नहीं थी क्योंकि हर कोई जानता था कि वित्त मंत्रालय कांटों का ताज है। उस समय मुख्य धारा का कोई भी नेता जो वित्त या उद्योग पृष्ठभूमि का नहीं रहा हो, वह वित्त मंत्रालय लेने से मना कर देता और कृषि या उद्योग मंत्रालय की मांग करता।’’ चिदम्बरम ने कहा,‘‘हम जानते थे कि उनकी राव की पहली पसंद आरबीआई के पूर्व गवर्नर आई जी पटेल थे। आई जी ने खुद मुझसे कहा था कि मैं उन्हें डॉ. सिंह को दूसरी पसंद नहीं बल्कि वैकल्पिक पसंद कहूंगा।’’ चिदंबरम ने कहा कि 1991 के चुनावों के बाद सत्ता में आने वाले राव ने पहले महीने में तीन बड़े ‘‘निर्णय’’ किए थे जिनमें मुद्रा का अवमूल्यन शामिल था जिसका कांग्रेस में ही विरोध था। इसके अलावा उन्होंने ‘‘औद्योगिकी नीति प्रस्ताव’’ और विनिवेश पर भी निर्णय किए थे।  

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