सियासत का भविष्य निर्धारित करेंगे गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम

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Monday, December 18, 2017-12:17 PM

नेशनल डेस्क, आशीष पाण्डेय: देश की सियासत का भविष्य तय करने वाले चुनावी परिणाम पर आज सबकी नजर है। गुजरात की सत्ता पर बीजेपी एक बार फिर से काबिज होती दिख रही है, लेकिन वर्ष 2012 की अपेक्षा में इस बार बीजेपी पर वोटरों का विश्वास कम होता दिख रहा है। जिसका असर लोकसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए गुजरात विधानसभा चुनाव को सेमीफाइनल माना जा रहा था। यह इसीलिए भी खास है क्योंकि गुजरात का चुनाव अपने-आप में बेहद खास है और केंद्र समेत राज्य की सत्‍ताधारी पार्टी के लिए यह चुनाव साख का विषय है। अब तक के रूझानों से साफ हो गया है कि कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्‍य में अपना विश्वास बढ़ाया है जबकि बीजेपी सत्ता पाकर भी हारती दिख रही है। लिहाजा माहौल बेहद दिलचस्‍प है।

इतना अहम क्‍यों है गुजरात चुनाव
गुजरात चुनाव इस बार जितना अहम बन गया था उतना अहम पहले कभी नहीं बना। इसकी कुछ खास वजहें हैं। पहली और सबसे बड़ी वजहों में आते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिनका वह गृह राज्‍य है। दूसरी वजह है उनके विकास का गुजरात मॉडल और तीसरी वजह है वहां पर दो दशकों से भाजपा का शासन है। कांग्रेस इन तीनों मोर्चो पर बीजेपी को कड़ी टक्कर देने की कोशिश कर रही है। 

राजकोट जिला है दिलचस्‍प
गुजरात में कुछ ऐसी सीटें हैं जहां पर मुकाबला न सिर्फ बेहद कड़ा है बल्कि दिलचस्‍प भी है। राजकोट जिला इन्‍हीं में से एक है। दरअसल, यह सिर्फ कुछ विधानसभा सीटों का प्रश्‍न नहीं है बल्कि साख का विषय भी है। लोकसभा सीट की बात करें तो 1989 से ही इस पर भाजपा का कब्‍जा रहा है। हम आपको बता दें कि राजकोट जिले के अंदर टंकारा, वांकानेर, राजकोर्ट पूर्व, राजकोट पश्चिम, राजकोट दक्षिण, राजकोट ग्राम्‍य और जसदान विधानसभा क्षेत्र सीट आती है। राजकोट की कुल सात विधानसभा क्षेत्र में से फिलहाल चार भाजपा के पास तो तीन पर कांग्रेस काबिज है। इसमें भी राजकोट पश्चिम एक ऐसा विधानसभा क्षेत्र है जिसका गुजरात की राजनीति में खासा महत्‍व है।
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155 का लक्ष्य नहीं है आसान
गुजरात विधानसभा के रूझान सामने हैं। बीजेपी को 115 सीट मिलने की संभावना हैं जबकि कांग्रेस को लगभग 75 सीट से संतोष करना होगा। दिलचस्प बात यह है कि नरेंद्र मोदी ने गुजरात में 155 से अधिक सीट मिलने का दावा किया था, उनके दावों की सच्चाई स​बके सामने आ चुकी है। वर्ष 2012 में बीजेपी के पास भी 115 सीटें थी जबकि कांग्रेस के पास केवल 61 सीट थी। ताजा रूझानों से समीक्षा करने पर 2012 का ही इतिहास बीजेपी दोहराती हुई दिख रही है। अंतिम तस्वीर में 10—15 सीटों के अंतर को अपेक्षित रखा जा सकता है।
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हार कर भी जीत गई कांग्रेस
बीजेपी ने जिस तरह कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था उसे जनता ने सिरे से खारिज कर दिया है। चुनाव परिणाम की तस्वीर से यह बात स्पष्ट होती दिख रही है। बीजेपी ने अपना गढ़ भले ही बचा लिया हो लेकिन दावा के अनुसार उसे लाभ नहीं मिला, बल्कि सीटों का नुकसान होता दिख रहा है। वर्ष 2012 में कांग्रेस को 61 सीट मिला था जबकि उसका वोट शेयर 38.9% था। ​इस बार के चुनावों में निश्चय ही कांग्रेस का वोट शेयर बढ़ा है। उससे आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए भी कांग्रेस को कुछ राहत मिलती दिख रही है, बीते लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस को गुजरात से एक भी सीट नहीं मिली थी। हालांकि उसका वोट शेयर 33.5% था।

1985 के बाद नहीं हारी भाजपा
गुजरात में दो दशकों से बीजेपी सत्ता में काबिज है। इसकी दो बड़ी वजह हैं। पहली वजह तो यह है कि 1985 के बाद से ही यहां पर भाजपा ने हार का स्‍वाद नहीं चखा है। दूसरी वजह यह है कि गुजरात के मौजूदा मुख्‍यमंत्री विजय रुपाणी भी यहां से आते हैं। उन्‍होंने यहां पर 2014 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस के जयंतीभाई कलारिया को 57 हजार से अधिक वोटों से हराया था। इनसे पहले नरेंद्र मोदी भी यहां से ही चुने गए थे। गौरतलब है कि 1967 में इस सीट पर हुए पहले विधानसभा चुनाव में यहां से स्‍वतंत्र पार्टी के उम्‍मीद्वार ने जीत हासिल की थी। इसके बाद 1975 में यहां से भारतीय जनसंघ और फिर 1980 में कांग्रेस आई ने जीत हासिल की थी। इस बार इस सीट पर विजय रुपाणी को इंद्रनील राजगुरू चुनौती देने उतरे हैं। वह फिलहाल राजकोट पूर्व से कांग्रेस के विधायक हैं। इस सीट पर वह विजय को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।
 

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