अब पराली का जहरीला धुआं नहीं उखाड़ सकेगा सांसें

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Wednesday, November 15, 2017-10:26 AM

चंडीगढ़(अर्चना) : हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़ समेत दिल्ली के लिए परेशानी का सबब बन चुकी पराली से अब निजात मिल सकती है। नैशनल इंस्टीच्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (नाइपर) और सैंटर फॉर इनोवेटिव एंड एप्लाइड बायोप्रोसैसिंग (सी.आई.ए.बी.) ने अब ऐसा फार्मूला खोज निकाला है जिसके दम पर पराली से चश्मे के फ्रेम के साथ-साथ अन्य कई प्रोडक्ट तैयार हो सकेंगे। 

 

संस्थान के वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में धान के अवशेष पर जो प्रयोग किया उसके परिणाम खासे उत्साह वर्धन रहे हैं। मौजूदा समय में वैज्ञानिकों ने 10 ग्राम की पराली पर अध्ययन किया है। जल्द ही 100 ग्राम पराली और उसके बाद 10 किलोग्राम पराली के पायलट प्लांट स्केल रिसर्च को पूरा किया जाएगा। प्रयोगशाला में मिले परिणामों से उत्साहित होकर वैज्ञानिक अब नाइपर के इस फार्मूले को बड़ी इकाईयों के साथ सांझा करेंगे जिससे पराली का प्रयोग न सिर्फ कई उत्पादों में किया जाएंगे बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति भी बेहतर बन सकती है। धान के अवशेषों से निकलने वाले जहरीले धुएं पर जल्द ही अंकुश लग सकेगा। 

 

नाइपर की प्रयोगशाला में पराली से सैल्यूलोज एसीटेट, सिलिका और नैनो सैल्यूलोज बनाने में सफलता मिली है। यह तीनों पदार्थ पेपर, प्लास्टिक, फैब्रिक, फाइबर, गिलास, सीमैंट, फार्मास्यूटिकल, एयरोनॉटिकल, डिफेंस एपलीकेशन, इलैक्ट्रॉनिक, पी.वी.सी. फ्लोर, पेंट इंडस्ट्री में बेहतर भूमिका निभा सकते हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो जहां एक एकड़ की पराली के लिए किसानों को 500 से लेकर 1000 रुपए का मुनाफा मिल सकेगा, वहीं अगर किसान खुद खेतों में सैल्यूलोज तैयार करने वाले प्लांट लगाता है तो प्रति किलो सैल्यूलोज तैयार करने पर किसान को 5 से लेकर 6 हजार रुपए तक मुनाफा हो सकता है। 

 

पराली को ठिकाने लगाना किसानों के लिए आसान नहीं :
डा. कार्था ने कहा कि खेतीबाड़ी के दौरान पराली निकलना तो तय है परंतु यह पराली को ठिकाने लगाना किसानों के लिए भी आसान नहीं है, क्योंकि पराली की कटाई भी आसान नहीं इसको आम मशीन के साथ काट भी नहीं सकते हैं। 

 

पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने भी पराली को ठिकाने लगाने के लिए एक तकनीक की खोज की है। तकनीक के अंतर्गत हैप्पी सीडर मशीन की मदद से पराली को काटकर वापस मिट्टी में डाल दिया जाता है। यह पराली मिट्टी में पहुंचकर खाद का रूप इख्तियार कर लेती है। पराली के खाद बनते ही किसान मिट्टूी में नई फसल के लिए बीज रोप सकते हैं और ऐसी मिट्टी बहुत बढिय़ा फसल उत्पन्न कर सकती है। 

 

सैल्यूलोज की मार्कीट देगी मुनाफा :
सी.आई.ए.बी. के वैज्ञानिक प्रो.शाशवत गोस्वामी ने बताया कि भले देश में सैल्यूलोज बनाने का काम नहीं चल रहा, परंतु वर्ष 2025 तक नैनो सेलूलोज की मार्कीट 8 बिलियन यूएस डॉलर होगी। जापान सरकार सैल्यूलोज में बिजनैस करेगी, जबकि पूरी दुनिया को 135 मिलियन टन प्रति वर्ष की जरूरत होगी। अगर पंजाब और हरियाणा के किसान खेतों में सैल्यूलोज निर्माण के लिए प्लांट लगाएंगे तो उनकी आर्थिक दशा बेहतर हो जाएगी। 

 

ऐसे है पराली सेहत के लिए हानिकारक :
पी.जी.आई. के पलमोनरी विभाग के पूर्व एच.ओ.डी. प्रो.एस.के.जिंदल का कहना है पराली की वजह से न सिर्फ श्वास रोगियों की सांसें उखडऩे लगती हैं बल्कि स्वस्थ लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा होता है। जलते हुए पराली से निकलने वाले धुएं में कार्बन पार्टिकल्स, कार्बन मोनोऑक्साइड मौजूद होते हैं जो सांस लेने पर लोगों के फेफड़ों तक पहुंच सकते हैं। ऐसे पार्टिकलस जिनका आकार 2.5 होता है वह व्यक्ति के फेफड़ों में पहुंचकर श्वास नली से चिपक जाते हैं। 

 

यही नहीं जो पराली अधजली रह जाती है वह सबसे ज्यादा खराब होती है। लंग पेशैंट्स को इंफेक्शन और निमोनिया का रिस्क बढ़ जाता है। डायबिटिक पेशेंट, बच्चों और बुजुर्गों की हेल्थ भी प्रभावित होती है। जब से पराली का धुआं आसमान में फैला है तब से चेस्ट क्लीनिक में आने वाले पेशैंट्स की संख्या में 3 से 4 प्रतिशत बढ़ गई है। डॉ. जिंदल का कहना है कि लोग ऐसी जगहों पर जाने से बचे जहां पराली का धुआं है। चंडीगढ़ की एयर क्वालिटी इंडैक्स भी पराली के धुएं की वजह से प्रभावित हो रही है। 


 

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