संसार में आवश्यकता मोहब्बत की है लेकिन फैलाई जा रही है नफरत। मोहब्बत फैलती है खुशबू की तरह धीरे-धीरे, एक दिल से दूसरे दिल तक लेकिन नफरत जंगल की आग की जगह फैलती है। जो कुछ रास्ते में आता है जलाती चली जाती है, राख  करती  जाती है।
जब नफरत ऐसे समाजों की तरफ से फैलाई जा रही हो, जो सभ्यता व संस्कृति के दावेदार हैं, ज्ञान-विज्ञान के ध्वजवाहक हैं, जीवन को आसान से आसान करने के लिए तकनीकी खोजें करते हैं, सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं, अनुसंधान, शिक्षा, सुसंस्कृति जिनकी विशेषताएं हैं तो बहुत आश्चर्य होता है कि क्या उनकी सभ्यता गर्त में गिरने को तत्पर है या यह सोची-समझी साजिश के अंतर्गत किया जा रहा है।


मुसलमान आबादियों, तीसरी दुनिया के देशों में लोगों को स्थानांतरित करके अपनी ही भूमियों में उनके हाथों सम्पत्तियां नष्टï करवाई जाएं, उनका ध्यान अपनी समस्याओं से हटाया जाए, फिर अपने घृणास्पद उद्देश्य प्राप्त किए जाएं। मुझे यह दूसरी संभावना ज्यादा जोरदार नजर आती है। मैंने इस विवादास्पद फिल्म की कोई झलक नहीं देखी लेकिन जो कुछ सुना है उसके अनुसार यह कोई स्तरीय फिल्म नहीं है। न कहानी के लिहाज से, न कलाकारों के लिहाज से और न ही कोई अन्य एतबार से।


इस फिल्म की तैयारी और फिर इसे हवा देने का उद्देश्य मुसलमानों में आक्रोश फैलाने के अलावा कुछ है ही नहीं। फिर उस समय जब अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं, जब मध्य पश्चिम में  ‘अरब बहार’ के परिणाम सामने आ रहे हैं, अमरीका की सरपरस्ती में आने वाली क्रांतियां ही अमरीका विरोधी साबित हो रही हैं। अमरीका क्या चाहता है, ऐसी महत्वहीन डायरैक्शन और ऐसी निम्न स्तरीय और बेहूदा फिल्म से मुस्लिम जगत में बेचैनी क्यों फैला रहा है। यहां अमरीका अपने ही विरुद्ध घृणा को क्यों भड़का रहा है। सी.आई.ए. निश्चित तौर पर इससे कुछ दूर रहकर इससे कोई परिणाम हासिल करना चाहती होगी।


पाकिस्तान में भी इस शरारती फिल्म के खिलाफ पूरा देश प्रदर्शन कर रहा है। शुक्रवार को तो अल्लाह से मोहब्बत अपने उच्च शिखर पर थी। पाकिस्तान सरकार भी बाकायदा  छुटटी का ऐलान करके इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बन गई और 21 सितम्बर को इश्क-ए-रसूल दिवस मनाया गया।  मेरे विचार में तो यह एक अच्छा और बुद्धिमतापूर्ण कदम है। प्रदर्शनों का रुख अमरीका और फिल्म बनाने वालों के विरुद्ध ही होना चाहिए। सरकार और जनता के मध्य लड़ाई नहीं होनी चाहिए। पहले भी कई बार पश्चिम की तरफ से ऐसी कोशिशें हो चुकी हैं। बाद में उनके असल उद्देश्य सामने आते रहे हैं। इस नफरत के विरुद्ध असली जरूरत एकता की है। मुसलमान एक-दूसरे को काफिर कहने का सिलसिला खत्म करें। इसके साथ-साथ पाकिस्तान में जो दूसरे धर्मों के मानने वाले रहते हैं, उनका भी सम्मान किया जाए। मौजूदा विरोध-प्रदर्शन में पाकिस्तान के विभिन्न शहरों में एक अच्छी बात देखने को आई कि इन विरोधी जलसे-जलूसों में हिन्दू, ईसाई और सिख संगठनों ने भी भाग लिया। पश्चिम की इस साजिश के विरुद्ध मिलकर प्रदर्शन किया।


मुसलमान आपस में घृणा की दीवारें गिराकर, तीसरी दुनिया के देश संगठित होकर पश्चिम के उद्देश्यों को असफल बना सकते हैं। हर मुसलमान  के लिए अपने प्यारे अल्लाह के अलावा कुछ नहीं है। हर इंसान के लिए यह हो सकता है कि वह इस महान नबी की शिक्षाओं का अध्ययन करें। कितनी सदियों से उनकी शिक्षाएं संसार के कितने हिस्सों में प्रकाश, स्वतंत्रता और समृद्धि का स्रोत बनी हुई हैं। दुनिया के बड़े भागों में इंसानों को गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाने में उनकी शिक्षाओं ने सहायता की। फूहड़़  रस्में  खत्म  हुईं, ज्ञान  प्राप्ति का दौर शुरू हुआ, औरत को बराबरी का दर्जा मिला।
पश्चिम ने यह भी देखा कि वह जिन रसूलों को मानते हैं मुसलमानों ने उनका कभी मजाक नहीं उड़ाया, न तौहीन की। वह खुद बाइबल का मजाक उड़ाते हैं। ईसा मसीह के बारे में भी अपमानजनक किताबें लिखते हैं, इस्लामी दुनिया में कभी कोई ऐसी किताब न लिखी गई और न ही कोई फिल्म बनाई गई। पश्चिम की तरफ से भी ऐसी घृणास्पद कोशिशें की जाती हैं। पश्चिम के विद्वान जब ताॢकक और आक्रोश आधारों पर इस्लामी शिक्षाओं के बारे में आलोचना करते हैं तो मुसलमान कभी गुस्से में नहीं भड़के। मुसलमान देशों और तीसरी दुनिया के लोगों को सहनशक्ति के साथ उन उद्देश्यों पर खोज करनी चाहिए। पश्चिम से नफरत के ऐसे सिलसिले क्यों शुरू किए जाते हैं और उनका सही जवाब क्या होना चाहिए?


मैं कुछ दिनों से इस्लामाबाद में हूं। अपने समाचारपत्र के लिए सब एडीटर और रिपोर्टर तलाश कर रहा हूं। पत्रकारों की नई नस्ल से मुलाकातें हो रही हैं। बहुत खुशी हो रही है कि नौजवान मीडिया का हिस्सा बनने के लिए उत्साहित हैं। दोनों देशों के बीच अच्छे संबंधों के इच्छुक हैं। आप तक भी उनकी भावनाएं पहुंचाना चाहता हूं कि पाकिस्तान में नई नस्ल, चाहे वह कराची में है, ङ्क्षसध से संबंधित है, पंजाब, खैबर, पख्तूनख्वा, ब्लूचिस्तान, गिलगित, बाल्तिस्तान या आजाद कश्मीर में रहने वाले नौजवान सीनियर पत्रकार, सभी पाकिस्तान को आगे बढ़ता देखना चाहते हैं और पाकिस्तान-हिन्दुस्तान के मध्य समाचार पत्रों का लेन-देन चाहते हैं। आने-जाने में आसानियां देखने के इच्छुक हैं। खून नहीं बहाना चाहते, नफरतों की दीवारें गिराई जानी चाहिएं।

कितना पास-कितना दूर
महमूद शाम