श्रीगणेश जी के अनेक नाम हैं जिनके स्मरण मात्र से ही भक्तों के संकट दूर होते हैं पर गणेश जी अधिकतर गजमुख, गजानन के नाम से जाने जाते हैं, क्योंकि उनका मुख गज यानी हाथी का है। भगवान गणेश का यह स्वरूप विलक्षण और बड़ा ही मंगलकारी है। सभी ने श्रीगणेश के गजानन बनने से जुड़ी पौराणिक कथा को सुना या पढ़ा होगा लेकिन क्या आप जानते हैं या विचार किया है कि गणेश का मस्तक कटने के बाद उसके स्थान पर गजमुख तो लगा, लेकिन उनका असली मस्तक कहां गया?
जानिए, उन प्रसंगों में ही उजागर यह रोचक कथा-पौराणिक मान्यता है कि जब माता पार्वती ने श्रीगणेश को जन्म दिया, तब इन्द्र,चन्द्र सहित सारे देवी-देवता उनके दर्शन की इच्छा से उपस्थित हुए। इसी दौरान शनिदेव भी वहां आए, जो श्रापित थे कि उनकी क्रूर दृष्टि जहां भी पड़ेगी, वहां हानि होगी। इसलिए जैसे ही शनि देव की दृष्टि गणेश पर पड़ी और दृष्टि पड़ते ही श्रीगणेश का मस्तक अलग होकर चन्द्रमण्डल में चला गया।
इसी तरह दूसरे प्रसंग के मुताबिक माता पार्वती ने अपने तन के मैल से श्रीगणेश का स्वरूप तैयार किया और स्नान होने तक गणेश को द्वार पर पहरा देने का आदेश दे किसी को भी अंदर प्रवेश से रोकने को कहा। इसी दौरान वहां आए भगवान शंकर को जब श्रीगणेश ने अंदर जाने से रोका, तो अनजाने में भगवान शंकर ने श्रीगणेश का मस्तक काट दिया, जो चन्द्र लोक में चला गया।
बाद में भगवान शंकर ने रुष्ट पार्वती को मनाने के लिए कटे मस्तक के स्थान पर गजमुख या हाथी का मस्तक जोड़ा। ऐसी मान्यता है कि श्रीगणेश जी का असली मस्तक चन्द्रमण्डल में है, इसी आस्था से ही धर्म परंपराओं में संकट चतुर्थी तिथि पर गणेश जी के पूजन उपरांत ही चन्द्रदर्शन व अघ्र्य देकर उपासना व भक्ति द्वारा संकटनाश व मंगल कामना गजानन से की जाती है।