डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को चेन्नई से लगभग 50 कि.मी. दूर तमिलनाडु राज्य के तिरुतनी गांव में हुआ था। उन्होंने मिशन स्कूल, तिरुपति व बेलौर और मद्रास क्रिश्चियन कालेज से शिक्षा प्राप्त की। 20वीं सदी के आरंभ में जब वैज्ञानिक प्रगति चरम पर थी, तब विश्व को अपने दर्शन से मुग्ध करने वाले आध्यात्मिक नेताओं में डा. राधाकृष्णन सर्वपल्ली सर्वप्रमुख थे।


उनका कहना था कि ‘‘चिडिय़ा की तरह हवा में उडऩा और मछली की तरह पानी में तैरना सीखने के बाद अब हमें मनुष्य की तरह जमीन पर चलना सीखना है।’’ मानवता की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने यह भी कहा, ‘‘मानव का दानव बन जाना, उसकी पराजय है, मानव का महामानव होना उसका एक चमत्कार है और मानव का मानव होना उसकी विजय है।’’ वह अपनी संस्कृति और कला से लगाव रखने वाले ऐसे महान आध्यात्मिक राजनेता थे जो सभी धर्मावलम्बियों के प्रति गहरा आदर भाव रखते थे।


उन्होंने कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठनों व शिष्टमंडलों का नेतृत्व किया। 1909 में वह चेन्नई के एक कालेज में दर्शन शास्त्र के अध्यापक नियुक्त हुए। इसके बाद कुछ समय तक वह आंध्र विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। 1948-49 में यूनैस्को के एग्जीक्यूटिव बोर्ड के अध्यक्ष रहने के बाद 1952-62 की अवधि में वह भारत के उपराष्ट्रपति भी रहे। 1962 में राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित होने के बाद 1967 तक वह इस पद पर बने रहे।
डा. राधाकृष्णन ने दर्शन और संस्कृति पर अनेक ग्रंथों की रचना की जिनमें ‘द फिलॉसफी ऑफ द उपनिषद्स’, ‘भगवद् गीता’, ‘ईस्ट एंड वैस्ट:सम रिफ्लैक्शंस’, ‘इंडियन फिलॉसफी’, ‘एन आइडियलिस्ट ब्यू आफ लाइफ’, ‘हिन्द व्यू आफ लाइफ’ आदि प्रमुख हैं। ‘भारतीय संस्कृति’, ‘सत्य की खोज’ एवं ‘संस्कृति तथा समाज’ हिन्दी में अनुवादित उनकी लोकप्रिय व महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। उनकी उपलब्धियों पर दुनिया भर के सौ से अधिक विश्वविद्यालयों ने उन्हें डाक्टरेट की उपाधि दी जिनमें हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय व ओवॢलन कालेज शामिल हैं। 1954 में भारत सरकार ने इन्हें सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया। उन्हें विभिन्न देशों में भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन पर भाषण देने के लिए बुलाया जाता था। उनमें विचारों, कल्पना तथा भाषा द्वारा लोगों को प्रभावित करने की विचित्र शक्ति थी। उनके राष्ट्रपति काल में 1962 में भारत-चीन युद्ध व 1965 में भारत-पाक युद्ध लड़े गए थे और इस दौरान अपने ओजस्वी भाषणों से उन्होंने भारतीय सैनिकों के मनोबल को ऊंचा रखने में सराहनीय भूमिका निभाई थी। उनके प्रसिद्ध विचार थे ‘‘दर्शनशास्त्र एक रचनात्मक विद्या है। प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की प्रतिमा है। अंतरात्मा का ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता। दर्शन का उद्देश्य जीवन की व्याख्या करना नहीं बल्कि जीवन को बदलना है। दर्शन का अल्प ज्ञान मनुष्य को नास्तिकता की ओर झुका देता है लेकिन दार्शनिकता की गहनता में प्रवेश करने पर मनुष्य का मन धर्म की ओर उन्मुख हो जाता है।’’ डा. राधाकृष्णन की मृत्यु 16 अप्रैल 1975 को हुई परन्तु अपने जीवन काल में उन्होंने अपने ज्ञान से जो प्रकाश फैलाया वह आज पूरी दुनिया को आलोकित कर रहा है। वह एक महान शिक्षाविद् थे और उन्हें अपने शिक्षक होने पर गर्व था। यही कारण है कि उनके जन्मदिन यानी 5 सितम्बर को ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।