बिहार में सब पर भारी है जातीय समीकरण !

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Friday, February 28, 2014-3:39 PM

पटना: भारत की राजनीति में आम आदमी पार्टी (आप) के अचानक हुए उदय को राजनीति में परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है परंतु बिहार की पार्टियां जिस तरह से चुनाव के पूर्व गठबंधन कर रही हैं, उसे देखकर लगता है कि उनके लिए जातीय समीकरण ही विकल्प हैं। वैसे बिहार मतदाता अभी इन मामलों को लेकर संदेह में हैं।

लोकसभा चुनाव की तिथि की घोषणा भले ही ना हुई हो, परंतु पटना के चौराहों पर सुबह-शाम चाय की दूकानों पर लगने वाली चौपालों में राजनीति को लेकर चर्चा जोर पकड़ रही है। इन चौपालों में खड़े एक व्यक्ति जहां हर-हर मोदी, घर-घर मोदी की बात करता है तो दूसरा व्यक्ति बात काटते हुए कहता है कि चुनाव से पहले ऐसे कितने ही मोदी हर बार आते हैं।

अभी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को लेकर बहस चल ही रही थी कि एक व्यक्ति ने चुटकी लेते हुए कहा कि जब तक समोसे में आलू रहेगा तब तक बिहार की राजनीति में लालू (लालू प्रसाद) रहेंगे।

इस बीच पटना के मीठापुर बस स्टैंड पर इस चौपाल पर खड़े बुद्घिजीवियों के बीच जातीय समीकरण को लेकर राजनीतिक गणित बनने और गठबंधन टूटने की बातें सुनने को मिलीं। अंत में यही दिखा कि बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण को दरकिनार नहीं किया जा सकता। सेवानिवृत प्रोफेसर भी झा कहते हैं कि चुनाव के पूर्व मतदाता भ्रष्टाचार और विकास की बात जरूर करते हैं हैं परंतु जब प्रचार अभियान प्रारंभ होता है तब ये मतदाता अपनी जाति के उम्मीदवारों और नेताओं की बात करने लगते हैं। पूरी राजनीति समझाते हुए झा ने कहा कि मोदी ने भी पटना में रैली के दौरान यादव मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास किया था। भाजपा और लोकजनशक्ति पार्टी (लोजपा) का गठबंधन भी इसी ओर इशारा करता है कि भाजपा पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को आकर्षित करने में जुटी है।

इधर, औरंगाबाद के राजकिशोर सिंह कहते हैं कि भाजपा के गठबंधन पर लोग उंगली क्यों उठा रहे हैं? क्या बिहार में सतारूढ़ जनता दल (युनाइटेड) के नेता नीतीश ने अल्पसंख्यक मतदाताओं के लिए भाजपा को सरकार से अलग नहीं किया? उन्होंने प्रश्न करते हुए कहा कि पिछले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को जनादेश दिया था, फिर भाजपा को क्यों हटाया गया? उन्होंने खुलकर कहा कि बिहार में अब नीतीश की दाल नहीं गलेगी।

इधर, अल्पसंख्यक बहुल किशनगंज के रहने वाले मोहम्म्द महताब गुजरात के दंगों की बात उठाते हैं। वे कहते हैं कि जब कोई नेता अपने राज्य को नहीं संभाल सकता तो वह देश को क्या संभालेगा? उनकी बात को काटते हुए पटना के महेश चंद्रवंशी कहते हैं आप गुजरात की बात छोड़ दीजिए बिहार के भागलपुर के दंगे के बाद लोगों ने कांग्रेस को माफ  नहीं कर दिया? भागलपुर दंगे में तो अब तक जांच ही चल रही है।

इधर, मोतिहारी के रहने वाले पंकज श्रीवास्तव का कहना है कि बिहार के मतदाता अभी बहुत असमंजस में हैं। आजादी के बाद से अब तक कोई ऐसा नेता नहीं आया जो लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरा हो। बहरहाल, बस अड्डे की इस चौपाल पर लोगों की बात से स्पष्ट है कि अगामी लोकसभा चुनाव में एक बार फिर बिहार में जातीय समीकरण हावी रहेगा और लालू के यादव और मुस्लिम समीकरण का साथ अगर मिल गया तो बड़ा उलटफेर हो सकता है। वैसे भाजपा भी पिछड़े और अतिपिछड़े वर्ग के मतदाताओं को लुभाने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस की चर्चा कोई नहीं करता। आगामी लोकसभा चुनाव नीतीश के लिए अब तक का सबसे कठिन चुनाव हो सकता है।


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