अमेठी व रायबरेली से नेहरू-गांधी परिवार का है रिश्ता

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Sunday, March 02, 2014-3:35 PM

लखनऊ: अमेठी एवं रायबरेली संसदीय क्षेत्रों से नेहरू गांधी परिवार का बहुत पुराना रिश्ता है। पंडित नेहरू स्वयं तो फूलपुर (इलाहाबाद) से सांसद बने लेकिन उनके दामाद फिरोज गांधी ने रायबरेली को अपनी कर्मभूमि के रूप में चुना। फिरोज गांधी ऐसे सांसद थे जो अपने गूढ़ एवं जनहित से जुड़े मुद्दों पर आधारित प्रश्नों एवं वाक पटुता से संसद में अपनी ही पार्टी की सरकार को कटघरे में खड़ा कर देते थे। संसद में सत्तापक्ष एवं विपक्ष दोनों तरफ के लोग इस तेज तर्रार नेता की तारीफ करते थे। वहीं फिरोज गांधी के निधन के बाद रायबरेली की रिक्त सीट पर बहुत आग्रह एवं मनुहार के बाद इंदिरा गांधी ने चुनाव लडऩे के लिये स्वीकृति दी और आजीवन(1977 से 1980 को छोड़कर) वह संसद में रायबरेली का प्रतिनिधित्व करती रहीं। बीच के कुछ वर्षों को छोड़कर रायबरेली सीट पर इसी परिवार का कब्जा रहा है। वर्तमान में भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी यहां से ही सांसद हैं।

अमेठी क्षेत्र में इस शक्ति संपन्न राष्ट्रीय-राजनीतिक परिवार की आमद सक्रिय रूप से सर्वप्रथम 1975 में हुई, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी ने अमेठी के अति पिछड़े गांव खेरौना में देशभर के चुनिंदा युवा कांगे्रसियों के साथ श्रमदान के माध्यम से सक्रिय राजनीति में आने का बिगुल बजाया। हालांकि ये बात अलग है कि आज तक उस खेरौना गांव की स्थिति जैसी कि तैसी ही बनी हुई है।  संजय गांधी के अमेठी में सक्रिय होने के साथ ही देश में आपातकाल घोषित हो चुका था। इसके बाद 1977 में संपन्न हुये लोकसभा चुनावों में संजय गांधी और इंदिरा गांधी की बुरी तरह पराजय हुई थी। इसके साथ ही उत्तर भारत में कांग्रेस बुरी तरह से पराजित हुई। यूपी, एवं बिहार में खाता ही नहीं खुला।

जे.पी. के गैर राजनीतिक अभियान ‘संपूर्ण क्रांतिÞ के बैनर तले यू.पी. की 85 एवं बिहार की 54 सीटों पर जनता पार्टी को रिकार्ड विजय मिली। 1977 में अमेठी के ही निवासी रवींद्र प्रताप सिंह ने संजय गांधी को हराकर संसद में प्रवेश किया। वहीं राजनारायण ने रायबरेली में इंदिरा गांधी को पराजित कर ऐतिहासिक जीत दर्ज की तथा केंद्र में मोरार जी देसाई की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बने थे। हालांकि जनता पार्टी की आपसी खींचतान और वैचारिक मतभेद के कारण इस सरकार का शीघ्र ही पतन हो गया और 1980 में संपन्न मध्यावधि चुनाव में इंदिरा गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस की वापसी हुई। इन्दिरा रायबरेली से पुन: निर्वाचित हुई जबकि संजय गांधी अमेठी के सांसद बने, लेकिन एक विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मौत हो गई।

गांधी परिवार ने कुछ समय बाद इस सदमें से उबरते हुए अमेठी के सियासी परिवार से ताल्लुक रखने वाले राजकुमार संजय सिंह सहित विभिन्न नेताओं के प्रयास एवं अनुरोध के फलस्वरुप राजीव गांधी को सक्रिय राजनीति में उतारा और वह 1981 में अमेठी से सांसद बने तथा अपने जीवन के अंतिम समय (20 मई 1991) तक संसद में अमेठी की रहनुमाई करते रहे। इसी दौरान संजय गांधी की पत्नी मेंनका गांधी पारिवारिक विवाद के कारण इंदिरा गांधी से अलग हो गईं। इसके बाद 1984 में इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी जटिल परिस्थितियों में राजीव गांधी को प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करना पड़ा था। 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ ही महीनों के बाद संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में सहानुभूति लहर का बेहद प्रभाव रहा तथा कांग्रेस को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ और राजीव गांधी देश के पुन: प्रधानमंत्री बने। विशेष रूप से युवाओं में राजीव ‘मिस्टर क्लीन’ के रूप में मशहूर हुए।

सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन इसी दौरान बोफोर्स तोप खरीद में दलाली का आरोप लगाते हुए तत्कालीन कैबिनेट मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। राजीव गांधी के लिए ये बेहद असहज स्थिति थी और इस मामले में उनकी बेहद किरकिरी हुई। इसी का परिणाम था कि 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाने की वजह से विपक्ष में बैठी। बदली राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस के ही समर्थन से विश्वनाथ प्रताप सिंह जनता दल की अगुवाई वाली सरकार में प्रधानमंत्री बने। हालांकि वह भी ज्यादा तक अपने साथियों का सियासी दबाव नहीं झेल पाए और आखिरकार अपनी राजनीतिक महत्वाकंाक्षा को पूरा करने के लिए उन्होंने मंडल कमशीन का दांव चलाया।

इसके बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन, आगजनी और यहां तक की आत्महत्या तक का दौर चला, जिसने भारतीय राजनीति में समाजिक और आर्थिक भूचाल ला दिया। आखिरकार देश फिर एक और चुनाव की ओर बढ़ ही रहा था कि इसी दौरान 1991 में चुनाव अभियान के दौरान ही राजीव गांधी की नृशंस हत्या कर दी गई। गांधी परिवार के लिए ये अब तक का सबसे बड़ा झटका था, क्योंकि अकेली सोनिया के साथ उनके छोटे बच्चे राहुल और प्रियंका भी थे। हालांकि कांग्रेस को जरूर इसका सियासी फायदा मिला और उसकी सत्ता में वापसी हुई। वहीं राजीव गांधी की अमेठी की विरासत को उनके परिवार के बेहद करीबी कैप्टन सतीश शर्मा ने संभाला। गांधी परिवार से करीबी का सतीश शर्मा को फायदा भी मिला और वह दो बार लगातार न सिर्फ सांसद बने बल्कि केंद्र में पेट्रोलियम मंत्री का भी कार्यभार उन्हें सौंपा गया। उन्हीं के कार्यकाल में अमेठी क्षेत्र में राजीव गांधी पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट की आधारशिला रखी गई।

वर्ष 2008 से यहां कक्षाएं संचालित हो रही हैं। लेकिन 1998 के लोक सभा चुनाव में अमेठी रियासत के राजकुमार डॉ. संजय सिंह ने भाजपा का दामन थामकर कैप्टन सतीश शर्मा के विजय रथ को रोक लिया। संयोगवश शीघ्र ही संसदीय चुनाव घोषित हुए और इस बार सोनिया गांधी ने अपने पति की पूर्व संसदीय सीट से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इस बीच रायबरेली की विशिष्ट सीट भी उनके ‘अपनों’ के ही कब्जे में रही। गांधी परिवार ने इसके बाद सियासत को खुलकर अपनाया और बाद में सोनिया गांधी ने जहां अपनी सास इंदिरा गांधी की संसदीय सीट रही रायबरेली को अपनाया वहीं उनके बेटे राहुल गांधी ने पिता की सियासत का गढ़ रहे अमेठी का नेतृत्व किया। राहुल गांधी 2004 के आम चुनाव में पहली बार अमेठी से सांसद बने और उनके प्रतिनिधियों ने क्षेत्र के विकास की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि आज तक अमेठी विकास की उस किरण को तरस रही है, जिसकी वहां के लोगों ने उम्मीद लगाई थी। वहीं गांधी परिवार का संसदीय क्षेत्र के लोगों के लिए बेहद कम उपलब्ध हो पाना भी लोगों की नाराजगी की अहम वजह है।

आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी कुमार विश्वास अब गांव-गांव जाकर इसी का सियासी फायदा उठाना चाह रहे हैं। वह खुलकर कह रहे हैं कि राहुल गांधी युवराज हैं, अमेठी की जनता उनसे मिलने को तरस जाती है लेकिन अगर वह जीते तो हर वक्त जनता के लिए उपलब्ध रहेंगे। हालांकि राहुल गांधी के प्रयासो से अमेठी में विकास की कई योजनाएं क्रियान्वित हुईं हैं तथा अनेक प्रस्तावित हैं। लेकिन बड़ी सच्चाई यह भी है कि कई योजनाओं का शुभारम्भ तो चुनावी बयार के दौरान होता है लेकिन बाद में उनकी कहीं कोई पता नहीं चलता। शिक्षा, चिकित्सा, सड़क, परिवहन आदि के मामले में आज भी अमेठी प्रदेश की कई वीआईपी संसदीय सीटों से कहीं पीछे है। कांग्रेस इसके पीछे भले ही सियासी वजह बताते हों, लेकिन अमेठी की जनता बार-बार इसी तर्क को सुनना नहीं चाहती। इसीलिए अपने ही गढ़ की गौरीगंज विधानसभा में राहुल गांधी को काले झंडे आदि दिखाए जाने जैसे विरोध का सामना करना पड़ चुका है। कांग्रेस दिखावे के तौर पर भले ही कुछ भी कहती रहे, लेकिन जिस तरीके से उसे पार्टी के अंदर और बाहर विरोध का सामना करना पड़ रहा है, वह कहीं न कहीं लोगों की उपेक्षा और क्षेत्रीय लोगों से दूरी का नतीजा है।


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