उत्तर-पूर्वी में प्रत्याशी के लिए कांग्रेस में होगा चुनाव

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Tuesday, March 04, 2014-10:25 PM

नई दिल्ली, (अशोक शर्मा): कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के निर्देश पर अब दिल्ली की एकमात्र लोकसभा सीट उत्तर-पूर्वी दिल्ली पर प्राइमरी प्रोसेस के अंतर्गत प्रत्याशी का चयन होगा। इसे लेकर कांग्रेस के नेताओं में ही काफी खींचतान होती नजर आ रही है। उम्मीदवार का चयन तो मतदान से ही किया जाएगा लेकिन नेताओं के साथ-साथ कार्यकत्र्ताओं में भी टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई है। 

प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में मंगलवार को काफी गहमागहमी नजर आई, जब कांग्रेस के 2 वरिष्ठ नेताओं और एक पूर्व विधायक ने पहुंचकर टिकट के लिए आवेदन किया। टिकट के लिए आवेदन करने वालों में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के  सांसद जयप्रकाश अग्रवाल, पूर्व केंद्रीय मंत्री जगदीश टाइटलर और करोलबाग के पूर्व विधायक राजेश लिलोथिया शामिल हैं।
 
याद रहे कि टिकट पाने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री जगदीश टाइटलर ने पहले से ताल ठोक रखी है। प्राइमरी प्रोसेस की इस प्रक्रिया में सफल होने के लिए पूर्व विधायक राजेश लिलोथिया भी अब  पूर्वी दिल्ली  सीट से टिकट पाने के लिए मैदान में कूद गए हैं।सांसद अग्रवाल दोपहर करीब 12 बजे अपने 2-3 सौ समर्थकों के साथ कार्यालय पहुंचे। उनके साथ विधायक मतीन अहमद और पूर्व विधायक भी थे जबकि टाइटलर दोपहर 2 बजे वहां पहुंचे। उनके साथ हरचरण सिंह जोश और राजेश कपूर सहित 100 से अधिक कार्यकत्र्ता थे। शीला दीक्षित के करीबी करोलबाग के पूर्व विधायक लिलोथिया ने भी अपने समर्थकों के साथ जाकर टिकट के लिए आवेदन किया।
 
उम्मीदवार का चयन आगामी 11 मार्च को मतदान द्वारा सम्पन्न होगा। उत्तर-पूर्वी दिल्ली से पार्टी के करीब 350 कार्यकत्र्ता इसमें मतदान करेंगे और जो भी अधिक मत पाने में सफल हो गया, पार्टी द्वारा उसे ही उम्मीदवार घोषित किया जाएगा। मतदान में भाग लेने वालों में इस संसदीय क्षेत्र के पार्टी के विधायक, सभी पूर्व विधायक, निगम पार्षद, पूर्व पार्षद, सेवादल, एन.एस.यू.आई., युवक कांग्रेस, प्रदेश पार्टी, महिला कांग्रेस के पदाधिकारी आदि भाग लेंगे।
 
असलियत यह है कि नेताओं के बीच होती दिख रही इस खींचतान से मतदान में भाग लेने वाले कार्यकत्र्ता काफी सहमें हुए दिख रहे हैं। किसी को नहीं पता कि क्या होगा और टिकट किसे मिलेगा। सभी  वोट देने के मामले में एक-दूसरे से हामी तो भर रहे हैं लेकिन किसे वोट देंगे, इस बारे में वे कुछ भी खुलकर बोलने से परहेज कर रहे हैं। 
 
इसकी वजह साफ है कि कोई किसी भी नेता का बुरा बनना नहीं चाहता है। उनकी सोच यह है कि यदि एक नेता का खुलकर प्रचार व समर्थन किया और किसी वजह से वह प्राइमरी प्रोसेस में मतदान के दौरान हार गया, तो जीतने वाले नेता की नजर में आ जाएंगे। इससे उनकी राजनीति पर फर्क पड़ सकता है, इसीलिए हर कोई खामोश है और कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है।

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