लिमिट बढ़ाने से गरीब पर गिरेगी गाज

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Wednesday, March 05, 2014-1:13 PM

नई दिल्ली: पन्द्रहवीं लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों की खर्च सीमा बढ़ाकर 40 से 70 लाख रुपए करने के फैसले की आलोचना शुरू हो गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या जिन अर्थों में चुनाव सुधार की जरूरत है, वह इस फैसले से हो पाएगा। चुनाव सुधार पर लगातार काम कर रही संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ए.डी.आर.) के फाऊंडर प्रोफेसर त्रिलोचन शास्त्री कहते हैं कि क्या लोगों के लिए काम करने की चाहत रखने वाला कोई नागरिक मौजूदा चुनाव व्यवस्था में अपनी उम्मीदवारी सुनिश्चित कर सकता है। उनका मानना है कि खर्च सीमा बढ़ाने के बाद आम नागरिक के लिए चुनाव लडऩा पहले से अधिक मुश्किल होगा।


नैशनल इलेक्शन वाच और ए.डी.आर. की ओर से जारी आंकड़े में सामने आया है कि 2009 में तब की लिमिट का औसतन सिर्फ 59 फीसदी राशि उम्मीदवारों ने अपने प्रचार के लिए खर्च किया। दूसरी तरफ नेताओं की ओर से ऐसे विचार आते रहे हैं कि तय लिमिट उनके खर्च के लिए काफी कम है। 2009 में बड़े राज्यों में लोकसभा चुनाव की लिमिट 25 लाख ही थी, जिसे 2011 में बढ़ाकर 40 लाख किया गया।  केंद्र सरकार ने अब चुनाव आयोग की सिफारिश पर इसे बढ़ाकर 70 लाख कर दिया है। हालांकि गोवा जैसे छोटे राज्यों के लिए यह लिमिट 54 लाख तय की गर्ई है।

प्रो. शास्त्री यह भी सवाल उठाते हैं कि पार्टियों की फंडिंग को ट्रांसपैरेंट बनाने के लिए प्रयास क्यों नहीं किया जाता। दूसरा बड़ा सवाल जो प्रो। शास्त्री के अलावा अन्य चुनाव सुधार की चाहत रखने वाले लोगों उठा रहे हैं, वह यह है कि यह लिमिट क्रॉस करने पर भी कड़ी कार्रवाई की व्यवस्था नहीं की गई है। ए.डी.आर. ने 2009 में चुनाव में जीतने वाले 437 सासंदों की ओर से दी कई जानकारी का विश्लेषण किया है। इन आंकड़ों में उन्हीं तथ्यों को शामिल किया गया है, जिन्हें सासंदों ने चुनाव आयोग को सौंपा है। 2009 के लोकसभा चुनाव में यू.पी. के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 25 लाख की लिमिट से अधिक 26।73 लाख के खर्च की बात स्वीकार की थी। हालांकि चौंकाने वाली बात यह भी है कि 2009  में चुने गए 317 सांसदों ने कहा कि उनको उम्मीदवार बनाने वाली पार्टियों ने उन्हें प्रचार खर्च में सहयोग नहीं किया। 120 सांसदों ने स्वीकार किया कि उनके प्रचार खर्च का कुछ हिस्सा पार्टियों की ओर से मिला था।


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