लोन घोटाले में पुलिस तीन माह बाद भी खाली हाथ

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Friday, March 07, 2014-2:22 AM
नई दिल्ली (सतेन्द्र त्रिपाठी/कुमार गजेन्द्र): दिल्ली नागरिक सहकारी बैंक में हुए करोड़ों के घोटाले में बैंक के कुछ अधिकारियों के अलावा दिल्ली पुलिस की भूमिका भी बेहद संदिग्ध रही है। पुलिस ने न्यायालय के आदेश पर अमर कालोनी थाने में 2 एफ.आई.आर. नंबर 498, 499 दिनांक 8 दिसम्बर 2013 को दर्ज तो कर ली लेकिन 3 महीने बीत जाने के बाद भी पुलिस की जांच इतने गंभीर मामले में 3 कदम भी नहीं चल पाई है। पुलिस की इस एफ.आई.आर. में बैंक के अधिकारियों व दलालों के आधा दर्जन नाम है। 
 
नियम के मुताबिक एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस को इन सभी लोगों से दस्तावेजों के आधार पर पूछताछ करनी चाहिए थी, लेकिन लगता है गरीबों के साथ हुए इस घोटाले में पुलिस की कोई दिलचस्पी नहीं है। 
 
उधर बैंक के अंदर भी इस घोटाले को लेकर चुप्पी साध ली गई। इस मामले की एफआईआर 8 दिसम्बर 2013 को दर्ज कर ली गई थी, लेकिन बोर्डके सदस्यों को 27 फरवरी 2014 को यानी करीब तीन महीने बाद इसकी जानकारी दी गई। बोर्ड के सदस्यों का कहना है कि इस घोटाले की एफआईआर की जानकारी चेयरमैन को तत्काल बोर्ड की बैठक बुलाकर दी जानी चाहिए थी। जिन लोगों के इस एफआईआर में नाम थे, उनसे एक अंडरटेकिंग भी ली जानी चाहिए थी। इसके अलावा बैंक के अंदर ही विभागीय कार्रवाई भी की जानी चाहिए थी। बैंक बोर्ड की ओर से ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाया गया है।  
 
हैरान कर देने वाली बात यह भी है कि एक आरोपी अधिकारी सुरेन्द्र रियाल को घोटाले के बाद बैंक की आर्बीटेशन ब्रांच में ट्रांसफर कर दिया गया। यह वह ब्रांच हैं, जहां लोन की सभी फाइलों को रखा जाता है। इस ट्रांसफर को भी एक साजिश माना जा रहा है। इस मामले में बैंक की ओर से एफआईआर की कापी रिजर्व बैंक और आरसीआर (रजिस्ट्रार कोऑपरेटिव सोसाइटी) को भेजी जानी चाहिए थी, लेकिन बोर्ड ने यह भी नहीं किया।  
बुधवार को वहीं कुछ और ठगे गए लोग सामने आए। इनमें नजफगढ़ के रहने वाले विनोद कुमार, बरवाला से ब्रहमप्रकाश, नरेला से राजबीर, इनके दो लड़के दिनेश और सचिन, नरेला से ईश्वर सिंह, ईश्वर, मंगोलपुर से अनिता, बुराड़ी से सुरेश पाल सिंह आदि शामिल हैं। इन लोगों ने भी बैंक के बोर्ड पर गंभीर आरोप लगाए हैं। इस मामले पर जब हमने बैंक के सीईओ उपेन्द्र गर्ग से संपर्क किया तो उनका कहना था कि वह दिल्ली से बाहर है। 

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