जुबां पर आ ही गई दिल की बात

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Friday, March 07, 2014-1:42 PM

नई दिल्ली (अभय कुमार) बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दिल की बात आखिर उनकी जुबां पर आ ही गई। सोलहवीं लोकसभा के लिए चुनाव की घोषणा होने के अगली ही दिन नीतीश कुमार का खुद को प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार बताना बड़ा राजनीतिक कदम है। नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री पद के लिए ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध करते हुए अपनी पार्टी को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग कर लिया था। अब नितीश के इस बयान से प्रतीत होता है कि पीएम की कुर्सी पर नजर होने के कारण ही उन्होंने राजग से अलग होने का फैसला किया था। हालांकि, पहले नीतीश पीएम पद के लिए अपनी दावेदारी से इनकार करते रहे हैं। उन्हें लगता था कि तीसरे मोर्चे का नेतृत्व कर पीएम पद थोड़े समय के लिए संभालने से बेहतर है बिहार में मजबूती से टिके रहना। नीतीश दूसरी बार बिहार के सीएम बने तो हैं, लेकिन पिछले कुछ समय में उनकी लोकप्रियता का ग्राफ नीचे आया है। बिहार में अब अकेले जदयू की लहर नहीं है और न ही वह अब भाजपा के साथ है। ऐसे में नीतीश को लगता है कि केंद्र की कुर्सी पर दांव लगाने के लिए यह उनके लिए सबसे उपयुक्त समय है। 

अनुभवियों की लंबी है सूची 

देवगौड़ा व गुजराल सरकर में मंत्री रहे इंद्रजीत गुप्त सबसे ज्यादा अनुभवी सांसद थे। अनुभव के मामले में मनमोहन सिंह से ज्यादा आगे अर्जुन सिंह, प्रणव मुखर्जी व अन्य कई नेता कांग्रेस में 2004 में थे मगर नीतीश ने इस पर कभी सवाल नहीं किया। स्वर्गीय ज्योति बसु देश में सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहे। हाल ही में भाजपा में शामिल अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री जोंग अपांग को बसु के बाद सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहने का अनुभव प्राप्त है। वर्तमान में सिक्किम के मुख्यमंत्री का कार्यकाल सबसे लंबा है। उनका 1994 से अब तक का कार्यकाल अच्छा भी मना जाता है। राजस्थान में स्वर्गीय मोहनलाल सुखडिय़ा 1954 से 1971 तक 17 साल मुख्यमंत्री रहे। 

तीसरे मोर्चे में कई दावेदार 

वर्तमान परिस्थितियों में किसी गैर कांग्रेस-गैर भजपा दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए जरूरी 273 सीटें मिलती नहीं दिख रही। तीसरे मोर्चे में प्रधानमंत्री पद के सबसे ज्यादा दावेदार हैं। जयललिता और मुलायम सिंह भी पीएम की रेस में हैं। नवीन पटनायक ने भी खुद की उम्मीदवारी खारिज नहीं की है। देवगौड़ा पहले भी प्रधानमंत्री रह चुके हैं और तीसरे मोर्चे के दावेदारों के बीच वह एकमत से पीएम पद के लिए स्वीकार किए जा सकते हैं। 

अनुभव तो मोदी के पास कम नहीं

 राजनीतिक कार्य का अनुभव नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी ताकत है। मोदी ने लगभग सभी राज्यों में पार्टी पर्यवेक्षक के तौर पर कार्य किया हैं। मोदी ने अपने राज्य व अन्य कई राज्यों में कम काम करने वाले विधायकों का टिकट काटने की परंपरा शुरू की। क्षेत्रीय पार्टियों में कई नेता हैं जिनका सांगठनिक अनुभव तो महत्वपूर्ण है मगर वह कुछ खास राज्यों तक ही सीमित है। अच्युतानंदन केरल तक, लालू यादव बिहार, शरद पवार महाराष्ट्र, मुलायम सिंह यादव व मायावती उत्तर प्रदेश तक सीमित हंै। 

केंद्र में भी कई जिम्मेदारी संभाल चुके हैं नीतीश

अगर हम नीतीश कुमार के राजनितिक सफर पर नजर डालें डालें तो वह 1977 और 80 में विधानसभा का चुनाव हार गए थे। 1985 में पहली बार विधायक बने। 1989 में जनता दल के टिकट पर संसद व केंद्र में कृषि राज्य मंत्री बने। 1991 में दुबारा संसद बने व पार्टी संसदीय दल के उप नेता चुने गए। बाद के दिनों में नीतीश केंद्र की वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री, कृषि मंत्री, सड़क परिवहन मंत्री। वह 2000 में बिहार में मुख्यमंत्री बने थे लेकिन बहुमत नहीं होने के कारन अपने पद से इस्तीफा देने को मजबूर हुए थे। नीतीश का यह कार्यकाल मुख्यमंत्री के रूप में उनका तीसरा कार्यकाल है।

मुलायम भी कुछ कम नहीं

भले ही नीतीश कुमार अपने आप को पीएम पद का दावेदार कह रहे हों लेकिन मुलायम सिंह यादव जो तीसरे मोर्चे के ही सदस्य हैं भी कुछ कम नहीं हैं। उनके अनुभव नीतीश कुमार से ज्यादा ही है कम नहीं। जहां नीतीश कुमार मुलायम सिंह को आठ बार विधायक, एक बार विधान पार्षद, पांच बार संसद, तीन बार मुख्यमंत्री व केंद्र में रक्षा मंत्री रहने का अनुभव है। पार्टी संगठन में महारत के पैमाने पर भी मुलायम नीतीश से बीस ही पड़ते हैं। नीतीश के खुद के पैमाने पर मुलायम ज्यादा उपयुक्त दिखते हैं।

 


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