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फर्जी दस्तावेजों पर बांटे करोड़ों के लोन

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Sunday, March 09, 2014-8:29 PM
नई दिल्ली(सतेन्द्र त्रिपाठी/कुमार गजेन्द्र): दिल्ली नागरिक सहकारी बैंक में हुए करोड़ों के घोटाले के मामले में कई और चौकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।। बैंक के अधिकारियों ने दलालों से मिलकर उन लोगों को भी करोड़ों के लोन बांट दिए, जो झुग्गियों में रहते थे। जिनके पास बैंक गारंटी के नाम पर कुछ नहीं था।
 
दलालों ने सभी लोन लेने वालों के बैंक रिटर्न, सैलरी स्लिप और अन्य दस्तावेज फर्जी तरीके से तैयार करवाए और उन्हीं पर लोन भी पास कर दिए गए। बैंक की ओर से आवाज उठाने वालों को धमकाने के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की धमकी दी जा रही है। 
 
दलालों ने झुग्गियों में रहने वाले अनुसूचित जाति के लोगों फ्री में मोटे लोन दिलाने का झांसा दिया था। उन्हें मैंबर बनाया और उनके फर्जी दस्तावेज और सिक्योर्टी लगाकर लोन पास कर दिए गए। पीड़ितों में से करीब आधा दर्जन लोगों ने साकेत कोर्ट की एक अदालत में बैंक और दोषी लोगों के खिलाफ धारा 156/3 के तहत एफ.आई.आर. दर्ज करने की अर्जी दी है। 18 मार्च को इसकी तारीख लगी है। शनिवार को सभी पीड़ित नवोदय टाइम्स के कार्यालय पहुुंचे, जहां उन्होंने आपबीती सुनाई। 
 
पीड़ित ईश्वर सिंह स्वतंत्र नगर इलाके के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि उनका परिवार नाले पर बनी झुग्गियों में रहता है। एक दिन उन्हें दलाल ग्यासी राम मिला। उसने उन्हें बताया कि वह उसे एससी कोटे से लोन दिला सकता है, जिसे बाद में कोर्ट के हिसाब से माफ कर दिया जाएगा।
 
इसके बाद ग्यासी ने खुद ही उसका मैंबरशिप फार्म भरा और बाकी जरूरी दस्तावेज भी खुद ही तैयार कर लगा दिए। बैंक की ओर से इन्हीं फर्जी दस्तावेजों पर उन्हें 5 लाख का लोन जारी कर दिया गया लेकिन बैंक ने उनसे 6 खाली चैक  ले लिए थे, जिनके आधार पर उनके खाते से पहले ही 1 लाख 41 हजार रुपए निकाल लिए गए।
 
इसी तरह बरवाला के रहने वाले ब्रह्मप्रकाश से 5 लाख के लोन पर 2 लाख रुपए, नरेला के रहने वाले राजबीर सिंह से साढ़े 4 लाख पर 1 लाख 86 हजार रुपए, राजबीर के 2 बेटों दिनेश और सचिन को 5-5 लाख के लोन पर ढाई-ढाई लाख रुपए रिश्वत के रूप में ले 
लिए गए। 
 
शिकायतकत्र्ताओं का आरोप है कि बैंक के तत्कालीन निदेशक जयभगवान का एक रिश्तेदार एक नामी इंश्योरेंस कंपनी में काम करता है, इसलिए जिन लोगों के भी बैंक की ओर से फर्जी लोन पास किए गए, उन्हें जबरन उक्त कंपनी की इंश्योरेंस पॉलिसी भी दे दी गई,  जिसकी सालभर की किश्त 12 हजार रुपए के आसपास थी। इंश्योरेंस का चैक बैंक अधिकारियों की ओर से चुपचाप उन 6 चैक में से दे दिया जाता था, जो बैंक पहले ही साइन करा कर अपने पास रख लेता था। 
 

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