बिहार में भाजपा 2 ‘राम’ के सहारे!

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Friday, March 14, 2014-11:49 AM

पटना: माना जाता है कि पिछली बार अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को केंद्र की सत्ता ‘राम मंदिर’ मुद्दे ने दिलाई थी। इस बार के लोकसभा चुनाव में अब तक कहीं भी यह मुद्दा नजर नहीं आ रहा है, लेकिन बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने दो ‘राम’ के सहारे राज्य की सभी 40 सीटों पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के उम्मीदवारों को जिताने की कोशिश की है। ये दोनों ‘राम’ हैं-रामकृपाल यादव और रामविलास पासवान। दोनों धर्मनिरपेक्ष छवि के नेता माने जाते रहे हैं।

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद के ‘हनुमान’ माने जाने वाले रामकृपाल बुधवार को दिल्ली में भाजपा की सदस्यता की ग्रहण कर ली। भाजपा की सदस्यता लेने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘मैं बताना चाहता हूं कि मेरा जेहन बिल्कुल सेक्युलर है और जब तक मैं जीवित रहूंगा मेरी आत्मा में सेक्युलरिज्म रहेगा।’’ रामकृपाल के इस बयान के कई मायने निकाले जा सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि रामकृपाल और रामविलास के हटने का प्रभाव  संप्रग पर पडऩे की संभावना है।

पटना के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीति के जानकार संतोष सिंह कहते हैं, ‘‘नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद भाजपा पर जो विपक्षी दल सांप्रदायिक होने का आरोप लगाते हुए उसे करीब ‘अछूत’ घोषित कर रहे थे, रामकृपाल के भाजपा में और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के राजग में शामिल होने से यह सोच बदलेगी और लालू के वोट बैंक में भी सेंध लगने की उम्मीद बढ़ी है।’’  संतोष कहते हैं कि राजग से जनता दल-युनाइटेड (जदयू) के अलग होने से जो स्थान रिक्त हुआ था, वहीं रामविलास जैसे दलित नेता के शामिल होने का प्रतीकात्मक फायदा बिहार में ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी मिलने की संभावना है। पूर्व में भाजपा को सवर्णों की पार्टी मानी जाती रही है।

यह तय है कि रामकृपाल अब लालू की पुत्री मीसा भारती के खिलाफ  पाटलिपुत्र सीट से चुनाव लड़ेंगे, सिर्फ आधिकारिक घोषणा बाकी है। रामकृपाल लालू प्रसाद के मुसलमान-यादव (एमवाई) समीकरण की मजबूत कड़ी के रूप में देखे जाते रहे हैं, उनके राजद छोडऩे का असर लालू के इस सबसे भरोसेमंद समीकरण पर पडऩे की काफी संभावना है।  वर्ष 2009 में भी रामकृपाल को पाटलिपुत्र से टिकट नहीं मिला था और लालू खुद यहां से चुनाव लड़े थे। उस समय भी रामकृपाल पार्टी नेतृत्व से नाराज हुए थे, लेकिन विरोध नहीं कर सके थे। पूर्व में रामकृपाल पटना संसदीय क्षेत्र से चुनाव चुनाव लड़ते थे। मगर परिसीमन के बाद वर्ष 2009 से इसका नक्शा बदल गया। अब पटना साहिब और पाटलिपुत्र दो सीटें हो गई हैं।

वैसे राजनीति के जानकार यह भी मानते हैं कि लालू के लिए राहत की बात यह है कि रामकृपाल की पहचान पटना के आसपास के क्षेत्रों में ही है, बिहार के अन्य क्षेत्रों में उनकी बड़ी राजनीतिक पहचान नहीं है। इधर, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) में रही लोजपा भी 12 साल बाद एक बार फिर राजग में प्रवेश कर गई है। माना जाता है कि पासवान की पहचान बिहार में न केवल धर्मनिरपेक्ष नेता की रही है, बल्कि पिछड़ी जातियों, खासकर अति पिछड़ी जातियों में उनकी खास पैठ मानी जाती है। बिहार में पिछड़े मतदाताओं की संख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का लगभग 11 प्रतिशत है।

इन 50 प्रतिशत पिछड़े मतदाताओं में अतिपिछड़े 30 से 32 प्रतिशत हैं जबकि शेष 20 प्रतिशत पिछड़ों में यादव, कुर्मी, कोइरी करीब 18 प्रतिशत हैं। राज्य में मुस्लिम आबादी 17 प्रतिशत है और यहां 13 लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां मुसलमानों की आबादी 18 से 44 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। सारण (छपरा) से राजद प्रत्याशी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी कहती हैं कि चुनाव के समय सभी पार्टियों में लोगों का आना-जाना लगा रहता है, जाने वाले को रोका नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि किसी भी नेता के जाने से पार्टी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। राजद आगे है और रहेगा।


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