बनारसी होली का एक रंग जेएनयू में भी

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Monday, March 17, 2014-12:55 AM

नई दिल्ली: बौद्धिक चाट, राजनैतिक चाट,खखोर चाट, खयालन चाट। अरे यह किसी ठेले पर बिकने वाले समोसे-चाट के प्रकार नहीं हैं बल्कि देश की प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू यूनिवॢसटी में मौजूद व्यक्तियों के प्रकार हैं। रविवार की रात इन सभी प्रकार के वरिष्ठ और कनिष्ठ छात्र झेलम हॉस्टल के लॉन में इकट्ठे हुएं। मौका था होली की पूर्व  संध्या के मौके पर बुलाई गई विशेष चाट का।


चाट में आने का न्योता देते हुए जे.एन.यू. से पी.एच.डी. करने वाले छात्र तारा शंकर ने एफ.बी. पर लिखा, हमारे जे.एन.यू. में प्रोफेसर लोग सालों भर क्रिएटिव रूप से हमें चाटते हैं। कभी टर्म पेपर, कभी सेशन, कभी बुक रिव्यू तो कभी सैमिनार... और न जाने क्या क्या। कल इनके चटने की बारी है।


कल कोई भेद नहीं रहेगा। गुझिया भी खाएंगे और इन्हें नचाएंगे भी.... जोगिरा बोल के.... दरअसल, इन पूरे कार्यक्रम के पीछे की मानसिकता को समझें तो कैंपस में हर कॉर्नर पर सालों पर विमर्श चलता रहता है। चाहे महिलाओं के अधिकार की बात हो, समाज में मजदूरों को बराबरी के अधिकार देने की बात हो या फिर कॉरपोरेट के खिलाफ प्रदर्शन की जरूरत।


छात्र उसमें गहरी दिलचस्पी भी लेते हैं लेकिन पूरी प्रक्रिया में उनका दिमाग भी पकता है। तो इसी मौके को इजहार करने के लिए वे इस कार्यक्रम का आयोजन करते हैं, जहां एक दूसरे से मजाक कर सकें। जे.एन.यू. के छात्रों का कहना है इसमें 14 साल से आयोजित होने वाले कार्यक्रम में गरिमा का ख्याल रखा जाता है।


एक छात्र ने कहा, खयालन चाट, जिसका खयाल भी आ जाए तो आप चट जाएं। शक्लन चाट, जिसकी शक्ल देख के ही आप चट जाएं और उस आदमी को देखते ही बगल का रास्ता ढूढऩे लगें। एन्वायरमैंटल चाट जिससे पेड़ पौधे, जानवर (माने कुक्कुर वगैरह भी) चट जाएं.. जिसके पास से हवाएं भी चट जाने के डर से गुजरने से कतराएं।


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