प्रदेश अध्यक्ष बिना कैसे जीतेंगे दिल्ली का किला

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Tuesday, March 18, 2014-11:42 PM

नई दिल्ली,(सतेन्द्र त्रिपाठी): पिछले लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों सीटें हारने वाली भाजपा की नैय्या इस बार कैसे पार होगी। केवल मोदी का नाम लेकर नैय्या पार होने वाली नहीं है। इस नैय्या को चलाने वाला कौन होगा। जिसके हाथ में प्रदेश की पतवार दी गई थी, उसे तो पार्टी ने खुद ही प्रत्याशी बना दिया। अब दिल्ली का चुनाव किसके नेतृत्व में होगा।


जब प्रदेश अध्यक्ष अपने चुनाव प्रचार में व्यस्त होंगे तो बाकी 6 प्रत्याशियों की सुध कौन लेगा। अभी तक किसी को कार्यकारी अध्यक्ष भी नहीं बनाया गया है। उत्तर पश्चिम दिल्ली सीट पर तो पार्टी में विद्रोह का बिगुल भी बज गया।

2 अन्य सीटों पर भी गुपचुप तरीके से विरोध हो रहा है। पुराने नेताओं पर भरोसा न कर बाहरी उम्मीदवारों को थोंपने पर ङ्क्षचगारी अब सुलग रही है। पार्टी का एक गुट कह रहा है कि वैसे तो संघ व्यक्ति विशेष का नाम न जपने की हिदायत देकर दशा व दिशा बदलने की बात करता है लेकिन पहले मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी, फिर प्रदेश अध्यक्ष और अब सांसद का टिकट देने के लिए उन्हें केवल डॉ.हर्षवर्धन ही नजर आए।

वह भी पूर्वी दिल्ली जहां से वह 5 बार से विधायक हैं, वहां से टिकट न देकर चांदनी चौक में उतारने की पीछे क्या सोच है। इतना ही नहीं कई अन्य सीटों पर पुराने नेताओं के नामों को नंजरअंदाज करके बाहरी व नए उम्मीदवार थोपने की जरूरत क्या थी।


उत्तर पश्चिम दिल्ली से दलित नेता उदित राज का तो कार्यकत्र्ताओं ने खुल्ला विरोध कर दिया है। कार्यकत्र्ताओं का कहना है कि लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रही अनिता आर्या का टिकट काटकर हाल ही में पार्टीन में आए उदितराज को कमान क्यों दी गई। कुछ ऐसी ही हालत पूर्वी दिल्ली में महेश गिरी की भी है। वह कुछ महीने पहले ही पार्टी में आए हैं।


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