तिमाही फीस न वसूलने के आदेश रद्द

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Friday, March 21, 2014-12:13 PM

नई दिल्ली : दिल्ली उच्च न्यायालय ने निजी स्कूलों को फिलहाल अंतरिम राहत देते हुए अपनी एक सदस्यीय खंडपीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें निजी स्कूलों को कहा गया था कि वह तिमाही फीस न वसूले, बल्कि बच्चों से हर महीने फीस ली जाए।

कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश बी.डी.अहमद व न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल की खंडपीठ ने निजी स्कूलों की याचिका पर सुनवाई करते हुए अपनी एक सदस्यीय खंडपीठ के आदेश को रद्द कर दिया है। 2 सदस्यीय खंडपीठ ने कहा इस मामले को फिर से एक सदस्यीय खंडपीठ के पास भेजा जा रहा है जो फिर से मामले पर विचार करें। साथ ही माता-पिताओं से कहा कि अगर वह एक साथ तिमाही फीस नहीं दे सकते हैं तो अपना पक्ष स्कूल के समक्ष रखें और स्कूल उस पर विचार करेंगे।


पिछले साल 10 अप्रैल को न्यायमूर्ति वाल्मीकी मेहता की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा था कि निजी स्कूल से एक महीने से ज्यादा की फीस नहीं ले पाएंगे। यह फीस बच्चे के माता-पिता को महीने की 10 तारीख तक जमा करानी होगी। खंडपीठ ने कहा था कि शिक्षा निदेशक को कानून के तहत ऐसा कोई अधिकार प्राप्त नहीं है जो इन निजी स्कूलों को यह अधिकार दे सके कि वह एक महीने से ज्यादा की फीस एक साथ ले सकें। महत्वपूर्ण है कि स्कूल माता-पिताओं सेे 3 महीने की फीस एक बार में लेते हैं।

इसी आदेश को स्कूलों ने 2 सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी थी। इस मामले में समरफिल्ड स्कूल में पढऩे वाले कुछ बच्चों के माता-पिता ने इस मामले में उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इन 10 बच्चों के परिजनों ने अपने अधिवक्ता अशोक अग्रवाल के जरिए दायर याचिका में कहा था कि निजी स्कूल बच्चों की फीस तिमाही लेते है, जो कि दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट 1973 के विरुद्ध है।

इसी कारण आजकल अधिकतर निजी स्कूल बच्चों की फीस एडवांस में लेने लग गए हैं। इतना ही नहीं कुछ स्कूल तो पूरे साल की फीस एक साथ ले लेते हैं। ऐसे में स्कूलों की यह हरकत माता-पिता के मूलभूत अधिकारों का हनन है।


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