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बीस की उमर में लिख गए थे अपनी मौत की खबर

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Friday, March 21, 2014-5:09 PM

जालंधर: माहाभारत में एक अनुच्छेद है जिसमें यह कहा गया है कि जिंदगी का सबसे बड़ा चमत्कार ये है कि जबकि हम इस बात को जानते हैं कि मृत्यु अवश्यंभावी है, इस बात में कोई विश्वास नहीं करता कि वह भी एक दिन मर जाएगा। हम इंसान मृत्यु और मरने को लेकर मोहासक्त रहे हैं। मैंने पहले कोशिश की कि इसको लेकर सहज हो जाऊं , लेकिन मैंने खुद को वैसा ही पाया जैसा कि धम्मपद में कहा गया है, जैसे जमीन पर फैंकी गई कोई मछली, उछल-उछल कर खुद को मृत्यु की शक्ति से आजाद करने की कोशिश करती है।

एक बार मैं बंबई में आचार्य रजनीश से मिला। मैंने उनसे अपने भय के बारे में बात की और उनसे यह पूछा कि इससे कैसे पार पाया जाए। उन्होंने मुझे बताया कि मौत के भय से पार पाने का एकमात्र जरिया यह है कि हम मरते हुए को देखें, मृत को देखें। मैं यह बहुत दिनों से करता रहा हूं। मैं शायद ही किसी की शादी में जाता हूं लेकिन अंतिम संस्कार में जरूर जाता हूं। मैं मृत व्यक्ति के रिश्तेदारों के साथ बैठता हूं और अक्सर निगमबोध घाट के श्मशानघाट भी जाता हूं और वहां चिता में आग लगते हुए और शरीर को लपटों में जलते हुए देखता हूं।...

मुझे टेनिसन की इन पंक्तियों से बड़ा सुकून मिलता है’
सूर्यास्त और शाम का तारा,
और मेरे लिए एक आखिरी साफ आवाज !
और शायद शराब घर की चीख पुकार भी नहीं,
जब मैं समुद्र की यात्रा पर निकल जाऊंगा..
गोधूलि और शाम का घंटा,
और उसके बाद सब अंधकार!
और हो सकता है न कोई उदासी हो न विदाई,
जब मैं निकलूं..
जहां तक मेरा संबंध है तो मृत्यु आखिरी पूर्ण विराम है। इससे आगे कुछ भी नहीं।...
मैंने इस बात को काफी पहले ही समझ लिया था कि मेरे पास जीने के लिए एकमात्र जीवन है, यह नहीं जानता था कि इसका अंत कब होने वाला है, इसलिए मैंने यह फैसला किया है इस जीवन से मैं जितना ले सकता था उतना ले लूं। मैंने अपना जीवन भरपूर जीया है। मैंने दुनिया घूमी है, अपनी इंद्रियों का आनंद उठाया है, प्रकृति की सुंदरता का आनंद उठाया है और उस सबका जो उसके पास देने के लिए था। मैंने सर्वश्रेष्ठ भोजन का स्वाद लिया है, बेहतरीन संगीत सुना है और बेहतरीन औरतों के साथ संभोग किया है।...

मेरे सभी समकालीन चाहे यहां, पाकिस्तान में या इंगलैंड में, जा चुके हैं। मुझे पता नहीं कि मेरा समय कब आएगा, लेकिन अब मैं मौत से और नहीं डरता।... मैंने अपना मृत्यु लेख 1943 में ही लिख लिया था जब मैंने 20 की उम्र को पार ही किया था। वह बाद में मेरी कहानियों के संकलन पोस्थुमस में प्रकाशित हुआ। इस लेख में मैंने यह कल्पना की है कि ट्रिब्यून मेरी मृत्यु की घोषणा पहले पन्ने पर एक छोटी-सी तस्वीर के साथ कर रहा है। उसका शीर्र्षक इस तरह से पढ़ा जा सकता था- ‘हमें सरदार खुशवंत सिंह की अचानक मौत के बारे में बताते हुए दुख हो रहा है। कल शाम 6 बजे उनकी मृत्यु हो गई। अपने पीछे वे...।

मुझे मौत का सामना तब करना पड़ा जब मेरी पत्नी का देहांत हुआ।... जब मेरा वक्त आए तो मैं नहीं चाहता कि मैं अपनी हंसी उड़वाऊं । मैं किसी के ऊपर बोझ बनना नहीं चाहता। मैं मदद के लिए रोना नहीं चाहता या ईश्वर से यह नहीं कहना चाहता कि वे मुझे मेरे पापों के लिए माफ कर दें। मैं उसी तरह से जाना चाहता हूं जिस तरह से मेरे पिता गए थे। उनकी मृत्यु शाम के स्कॉच पीने के कुछ मिनट बाद ही हो गई।

                                                                                                                                                पुस्तक ‘खुशवंतनामा’ से साभार, 
                                                                                                                                      प्रकाशक : पेंगुइन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड

 


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