इतनी बेरहम सज़ा शायद आज तक किसी को नहीं मिली होगी! (देखो तस्वीरों)

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Monday, March 24, 2014-4:21 PM

नई दिल्ली: जब व्यक्ति कोई गुनाह करता है तो हर देश का कानून उसे एक निश्चित समय के लिए सज़ा देता है, परन्तु इस शख्स को जो सज़ा भारत के कानून ने दी, वह आज तक दुनिया के किसी भी शख्स को नहीं मिली होगी। 37 सालों से बिना सुनवाई के जेल में बंद इस व्यक्ति के लिए बाहर आने के बाद भी जि़ंदगी का कोई मतलब नहीं है।

प्राप्त जानकारी मुताबिक 1968 में जगजीवन नाम के व्यक्ति को अपनी भाभी की हत्या करने के मामले में पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था। उस समय जगजीवन की उम्र 28 साल की थी। पूरे 37 सालों तक जगजीवन बिना किसी सुनवाई, बिना किसी बहस और बिना किसी फ़ैसले के सलाखों के पीछे कैद रहा। पुलिस और अदालत दोनों ही 37 सालों तक उस पर मुकदमा चलाना भूल गए। इस तरह जगजीवन की पूरी जि़ंदगी सलाखों ने निगल लिए। जगजीवन पर अपनी भाभी की हत्या का शक था और इसी शक के आधार पर खंडासा पुलिस ने जगजीवन को गिरफ़्तार कर लिया और जेल भेज दिया। जेल में कुछ देर बाद जगजीवन की दिमाग़ी हालत बिगडऩे लगी। लिहाज़ा जि़ला अदालत ने जगजीवन को बनारस के एक अस्पताल में भेज दिया और जेल प्रशासन को उसकी दिमाग़ी हालत के बारे में हर तीसरे महीने रिपोर्ट देने के लिए कहा परन्तु 37 सालों में एक भी रिपोर्ट अदालत तक नहीं पहुंची। समय बीतने के साथ जेल प्रशासन और पुलिस साथ-साथ अदालत भी जगजीवन को भूल गई।

पुलिस और जेल के अफसरों ने शुरू से ही जगजीवन के घर वालों को उसके बारे में गुमराह किए रखा। जब जगजीवन की पत्नी और बेटा उसे मिलने आते थे तो उनको जगजीवन के साथ नहीं मिलने दिया जाता था। वह घर वालों को जगजीवन के साथ मिलवाते भी कैसे, क्योंकि वह ख़ुद जगजीवन को वाराणसी पागलखाने भेजने की बात को भूल चुके थे। लम्बी इंतज़ार के बाद जगजीवन के घर वालों ने यह सोच कर सब्र कर लिया कि शायद जगजीवन अब इस दुनिया में नहीं रहा। दूसरी तरफ़ जगजीवन अपने परिवार वालों को पागलों की तरह ढूंढ रहा था। उसने जेल से कई चिट्ठियां अपने घर वालों के लिए लिखीं परन्तु उनमें से एक भी चिट्ठी उसके घर वालों तक नहीं पहुंची। इस तरह एक मुलजिम बिना सुनवाई के सज़ा काटता रहा और पुलिस के साथ-साथ जेल प्रशासन चैन की नींद सोता रहा।

लम्बे समय के बाद जब अस्पताल प्रशासन ने जगजीवन की दिमाग़ी हालत सही होने की रिपोर्ट जेल आधिकारियों को दी तो सब हैरान रह गए। रिपोर्ट मिलने के बाद घबराई पुलिस ने फाइलें ढूंढनीं शुरू की परन्तु इतना पुराना रिकार्ड संभालना बहुत मुश्किल था। पुलिस को इस केस के कागज़ात तो नहीं मिले परन्तु अलबत्ता पुलिस को एक कागज़ मिला, जिसमें सिर्फ़ जिसका कत्ल हुआ है उसका नाम और पता दर्ज था। देश के कानून मुताबिक हर मुजरिम को उम्र कैद मतलब 14 सालों की सज़ा मिलती है परन्तु जगजीवन तो तीन गुणा ज़्यादा सज़ा भुगत चुका था। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने जगजीवन को रिहा कर दिया और पूरे 37 सालों के बाद 2006 में जगजीवन आज़ाद हो गया। इस के बाद ही जगजीवन के परिवार वालों को पता लगा कि वह जि़ंदा है।

37 साल पहले जब वह जेल गया था तो उसका बेटा केशव डेढ़ साल का था परन्तु जेल से बाहर आने तक उसके बेटों का विवाह हो चुका था और उसके पांच बच्चे थे। जगजीवन ने अपने बेटे को बड़ा होता न देख सका और न ही उसके विवाह में शामिल हो सका। जगजीवन को जेल में से आज़ाद हुए पूरे 8 साल हो चुके हैं। उस समय वह 65 सालों का था और अब उसकी उम्र 73 साल ही हो चुकी है, परन्तु 37 साल उस नासूर ने जगजीवन के दिल से, दिमाग़ पर ऐसा प्रभाव पाया कि जेल से बाहर आते ही वह ख़ामोश हो गया। उसकी आवाज़ लगभग गुम हो गई है। रिहाई के बाद भी 37 सालों का अकेल्लापन जगजीवन की जि़ंदगी से दूर नहीं हो सका है।


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