लो-फ्लोर बस: नियमों की अनदेखी

  • लो-फ्लोर बस: नियमों की अनदेखी
You Are HereNcr
Thursday, March 27, 2014-2:44 PM

 नई दिल्ली (कार्तिकेय हरबोला): सार्वजनिक परिवहन में विक्लांग व बुजुर्गों के सफर को सुगम बनाने के लिए बेशक सरकार लो-फ्लोर बसों को दिल्ली परिवहन निगम (डी.टी.सी.) के बेड़े में शामिल किया हो, लेकिन इन्हें चलाने वाले कर्मचारियों को उनकी जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाने में सरकार विफल रही है। सबसे ज्यादा समस्या पश्चिमी दिल्ली के गांव-देहात में है। यहां चालक-परिचालक अपनी मनमर्जी से बसों का परिचालन करते हैं।

इससे यात्रियों को परेशानी हो रही है। डी.टी.सी. के बेड़े में लो-फ्लोर बसों को शामिल करने का एक फायदा यह गिनाया गया था कि इसमें बुजुर्ग, विक्लांग और महिलाएं आसानी से यात्रा कर सकेंगी। व्हीलचैयर समेत कोई शख्स इसमें सवार होना चाहे तो उसे कोई परेशानी नहीं होगी। 

सुविधाजनक बस स्टैंड नदारद

लो-फ्लोर बसों में बस के पिछले हिस्से में यात्रियों के चढऩे के लिए जो गेट है, उसमें एक स्लाइडर है, ताकि कोई व्हील चैयर पर बैठा शख्स बस स्टॉप से लो-फ्लोर बस में चढऩा चाहे तो वह सुविधाजनक तरीके से चढ़ पाए। मगर, नई दिल्ली इलाके को छोड़ कहीं ऐसे बस स्टैंड नहीं बनाए गए हैं, जहां विक्लांग लो-फ्लोर बस में आसानी से उतर चढ़ सकें। गौरतलब है कि डी.टी.सी. की पुरानी स्टैंडर्ड बसों की जमीन से ऊंचाई करीब 25.75 इंच होती है, जिसमें बुजुर्ग व विक्लांगों को परेशानी होती है। वहीं, लो फ्लोर बसों की ऊंचाई 9.0 इंच है।

इसमें चढऩा-उतरना सुविधाजनक है। अक्तूबर 2010 में राष्ट्रमंडल खेल आयोजित होने से लो-फ्लोर बसों की बड़ी खेप की आपूर्ति का ऑर्डर दिया गया, लेकिन 3781 बसें आने के बाद भी जरूरतमंदों को सुविधा कैसे दी जाए, विभाग के कर्मचारियों को पता नहीं है।

दिल्ली सरकार में पूर्व परिवहन मंत्री रहे रमाकांत गोस्वामी ने डी.टी.सी. के कुल 46 डिपो मैनेजर को अपने अधीन कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने का निर्देश था, लेकिन यह निर्देश सिर्फ हवाई ही रहा। 87 प्रतिशत चालक-परिचालक को यह नहीं मालूम कि व्हीलचैयर पर कोई शख्स बस में यात्रा करना चाहता है, तो उसे कैसे बिठाएं।


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You