क्या मोदी के धागे बुनकर कसेंगे?

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Saturday, March 29, 2014-5:06 AM

वाराणसी : अच्छा कौन, सूरत का सिल्क या बनारस की शानदार बुनाई। काशी से चुनाव मैदान में उतरने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को यहां के बुनकरों की रोजी-रोटी के सवालों से भी दो-चार होना पड़ेगा। काशी के बुनकरों का मानना है कि उनकी बुरी दशा के लिए पावरलूम का इस्तेमाल एक बड़ा कारण है। सूरत के पावरलूमों ने काशी के कारीगरों के हाथ का काम छीन लिया। अब मोदी को स्थानीय लोगों के इस सवाल का भी जवाब देना होगा कि काशी की कारीगरी को सूरत के पावरलूमों जैसा बनाने के लिए वे क्या कदम उठाएंगे। सवाल यह भी है कि काशी से ताल ठोक रहे मोदी के धागे क्या यहां के बुनकर भी कसेंगे?

बनारस के लोगों का कहना है कि सूरत में सस्ती साडिय़ों का उत्पादन काशी के हथकरघा उद्योग को नुक्सान पहुंचा रहा है। स्थानीय लोग कहते हैं कि सूरत के कपड़ा उद्योग के विकास और काशी के पतन की कथा लगभग साथ ही शुरू होती है। मदनपुरा के साथ ही कोयला बाजार, रेवारी तालाब, बजरडीहा और बड़ी बाजार के बुनकरों की हालत कमोबेश एक जैसी है और सभी के सवाल भी एक हैं।

बजरडीहा के कारीगरों का कहना है कि सूरत के पावरलूम कारीगरों ने बनारस के डिजाइनों की नकल शुरू कर दी और यही काशी के कारीगरों के लिए विनाशकारी साबित हुआ। बनारस में आज भी धागे की कताई और कपड़े की बुनाई हाथों से होती है। इसमें काफी समय तो लगता ही है, नए प्रयोगों की गुंजाइश भी कम होती है। इसके बरअक्श सूरत की स्पिङ्क्षनग मिलों में बड़े पैमाने पर सिंथैटिक और पॉलिस्टर के कपड़ों का उत्पादन कम समय में हो जाता है। एक अच्छी असली बनारसी साड़ी कम से कम 10 हजार रुपए में मिलती है। इतने में सूरत में बनी 5 साडिय़ां खरीदी जा सकती हैं।

नब्बे के दशक में बड़ी संख्या में बनारस के कारीगरों को सूरत जाने पर मजबूर होना पड़ा। जो काशी में रह गए वे अपना कामकाज चलाने के लिए सजावटी साजो-सामान बनाने लगे। कारीगरों का कहना है कि हाल के दिनों में टैक्सटाइल मंत्रालय को संभालने वाले लोग दक्षिण और पश्चिमी राज्यों से रहे। ऐसे में सरकारी नीतियां भी वैसी ही बनाई गईं जो उन राज्यों के लोगों के हितों की रक्षा करें। कांजीवरम, हैदराबादी उप्पड्डा, महाराष्ट्र की पैथानी और गुजरात के पाटन पटोला के कारीगरों को रेशम के धागों की खरीद पर छूट दी गई। अब मोदी को यहां ऐसे सवालों का सामना करना होगा। साथ ही यहां के लोगों व उद्योगों की मांग को पूरा करने का दबाव उन पर होगा।

आर्थिक जानकारों का कहना है कि मोदी को एक सशक्त पी.एम. कैंडिडेट के तौर पर देखा जा रहा है। अगर वह चुनाव जीतते हैं, तो एक सक्षम सांसद होंगे। ऐसे में अगर वाराणसी साड़ीउद्योग को विशेष दर्जा मिल जाए तो काफी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।


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