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वंशवाद की बेल: बिहार के नए पौधे

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Saturday, March 29, 2014-10:08 AM

नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में वंशवाद कोई नई बात नहीं है। चाहे केन्द्र की राजनीति हो या राज्यों की, नेताओं के बेटे, बेटियों के लिए चुनाव लडऩे का मैदान हमेशा खुला रहता है। वे अपनी मर्जी से दूसरे क्षेत्रों में न जाते हों ऐसा नहीं है लेकिन वहां कामयाब न होने पर आसानी से राजनीति में दस्तक दे देते हैं। इस चुनाव में बिहार से वंशवाद के दो ऐसे ही प्रतीक मैदान में हैं। 

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद की डॉक्टर बिटिया मीसा भारती और रामविलास पासवान के स्टार लुक वाले पुत्र चिराग़ पासवान अपने-अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभालने को मैदान में उतरे हैं। ये दोनों पहली बार कोई चुनाव लड़ रहे है। दोनों की शुरुआत सीधे आम चुनाव से हैं। दोनों ही उम्मीद और आत्मविश्वास से भरे मालूम पड़ते हैं। चुनाव में जीत के लिए दोनों के पास अपने-अपने पिता का नाम है और दोनों ही दुनिया के सबसे अधिक युवा मतदाता वाले देश भारत में युवाओं का भरोसा जीतने में सक्षम होने का दावा करते हैं।

मीसा भारती: विरासत बचाने की चुनौती
नाम के पीछे की कहानी
मीसा का जन्म आपातकाल के दौरान हुआ था। तब उनके पिता मेनटेनैंस ऑफ़  इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा) के तहत जेल में बंद थे। वहीं बिटिया के जन्म की ख़बर मिली। पिता लालू प्रसाद ने पहली संतान की ख़बर जेल में बंद आंदोलनकारी साथियों से भी बांटी। बात बिटिया के नाम रखने तक पहुंची और मीसा नाम पर आम सहमति बन गई, और बेटी का नाम मीसा रखा गया। मीसा की शादी भी काफी विवादों में रही। शादी के लिए पटना के जितने भी कार डीलर थे, उन सभी नई कारों को भी उठवा लिया गया था और शादी के 15 दिन बाद भी वापस करने में आनाकानी की गई थी।

चुनावी तैयारियां

मीसा पाटलिपुत्र से चुनाव लड़ रही हैं। उनके चुनाव की तैयारियों की जि़म्मेदारी भारतीय प्रबंधन संस्थान (आई.आई.एम.), लखनऊ से एम.बी.ए. कर चुके पति शैलेश समेत पार्टी के अन्य वरिष्ठ सदस्य संभाल रहे हैं। पति शैलेश के मुताबिक, मीसा में अद्वितीय नेतृत्व क्षमता है। वह हजारों की भीड़ से भी बड़ी आसानी से संवाद बना लेती हैं।

शुरूआत में ही विरोध
मीसा को पार्टी अध्यक्ष की बेटी होने से सीधे लोकसभा चुनाव का टिकट मिला तो उन्हें कड़े विरोध का सामना भी करना पड़ा। लालू के पुराने सहयोगी और मीसा के मुंहबोले चाचा रामकृपाल यादव पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए।  मीसा नाराज़ चाचा को मनाने के लिए दिल्ली तक आई लेकिन रामकृपाल उनसे नहीं मिले। मीसा कहती हैं कि चाचा ने कभी भी इस लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लडऩे की इच्छा नहीं जताई थी। उनका राज्यसभा में 20 महीने से अधिक का कार्यकाल शेष है। फि र मेरी उम्मीदवारी से ही नाराजग़ी क्यों? क्या चाचा यह कहने को तैयार हैं कि उनके परिवार का कोई सदस्य किसी चुनाव में हिस्सा नहीं लेगा। मीसा का राजनीतिक जीवन शुरू हो चुका है, इसलिए वह अपने विरोधी से सवाल करना भी सीख गई हैं।

आगे बढ़ाना है पिता का संघर्ष
मीसा का कहना है कि जो लोग उनकी उम्मीदवारी को वंशवाद के आईने से देख रहे हैं, वो भूल कर रहे हैं। उन्होंने कहा, मेरी उम्मीदवारी सत्ता नहीं बल्कि पिताजी के संघर्ष और सेवा का वंशवाद है, इसे मैं जारी रखूंगी, मैं एक युवा महिला हूं। मीसा को महिला होने का अतिरिक्त फायदा मिल सकता है ।     

चिराग पासवान: सिनेमा से सियासत तक
‘मिले न मिले हम’  
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में बी.टैक चिराग पासवान बॉलीवुड में भी अपनी किस्मत आजमा चुके हैं। फि ल्म ‘मिले न मिले हम’ में कंगना राणावत के साथ काम किया। फिल्म कोई खास नहीं चली और चिराग राजनीति की तरफ बढऩे लगे।

उपचुनाव से हुए सक्रिय
बिहार के महाराजगंज लोकसभा उपचुनाव-2013 में चिराग की पहली सक्रिय उपस्थिति ने बहुत कुछ साफ  कर दिया था। अब चिराग को लगने लगा था कि बॉलीवुड नहीं बल्कि बिहार की राजनीति ही उनका भविष्य है।

मिली सुरक्षित सीट
बिहार के जमुई (सुरक्षित) लोकसभा क्षेत्र से लोजपा उम्मीदवार चिराग का कहना है कि राजनीति उनकी रगों में बहती है। उन्हें भाजपा से गठबंधन और इसके प्रधानमंत्री प्रत्याशी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से ताकत मिलती दिख रही है।

उपनाम का फायदा एक सीमा तक
अब पार्टी के उम्मीदवार हुए तो दल पर वंशवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया। चिराग कहते हैं अगर काबिल हैं तो आप कहीं भी अपनी जगह बना सकते हैं। उपनाम के भरोसे आप एक हद तक ही जा सकते हैं । चिराग के मुताबिक, लोगों को मेरी योग्यता पर पूरा भरोसा है। मैंने ऐसे लोकसभा क्षेत्र का चयन किया है जिस पर पार्टी के किसी भी सदस्य की कभी कोई दावेदारी नहीं थी।

भाजपा से गठबंधन में अहम रोल
माना जा रहा है कि लोजपा और भाजपा के बीच समझौता कराने में चिराग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।  उनके पिता रामविलास पासवान शुरू में इस गठबंधन के लिए तैयार नहीं थे। उनकी अपनी वैचारिक सीमाएं थीं लेकिन चिराग का मानना है कि मोदी के पास विजन और युवा सोच है। इस मुद्दे पर पिता-पुत्र में कई बार बातें भी हुईं।

जिम्मेदारी का काम है राजनीति
बॉलीवुड की ओर फि र से रुख करने की संभावना से इन्कार करते हुए चिराग कहते हैं कि राजनीति बड़ी जिम्मेदारी भरा क्षेत्र है। इसमें हॉफ टाइम या पार्ट टाइम की गुंजाइश नहीं है। अभी मैने शुरूआत की है, आगे बहुत कुछ करना है।            


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