एलियंस बनाम मोदी!

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Monday, March 31, 2014-12:44 AM

नई दिल्ली: चुनावों के दौर में जहां एक ओर विभिन्न राजनीतिक दलों और वरिष्ठ नेताओं पर गंभीर विश्लेषण किए जा रहे हैं वहीं उन भाव-भंगिमाओं पर चुटकुले, कार्टून आदि भी बनाए जा रहे हैं। एक वैबसाइट ने नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को लेकर जो कल्पना गढ़ी है, वह बहुत पसंद की जा रही है। उसके मुताबिक बहुत लोग मोदी के व्यक्तित्व से डरे हुए हैं। जैसे वह मनुष्य न होकर किसी दूसरे ग्रह के प्राणी हों। उनसे तो अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी भयभीत हैं और उन्हें अपने देश में आने की अनुमति नहीं देना चाहते। एक कॉमिक्स के रूप में बताया गया कि बचपन में मोदी ने मगरमच्छ को पकड़ा था इसलिए उनसे तो एलियंस भी घबराते हैं। दूसरी ओर उनके विकास के दावों पर भी मजेदार कटाक्ष किया गया है कि गुजरात में इतना विकास हुआ है कि अब यहां मच्छर इतिहास की बात हो गए हैं जिन्हें तस्वीरों में ही देखा जा सकता है।

पैकेज के बदले समर्थन?: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने 10 सालों के कार्यकाल के दौरान नागालैंड जाने में असमर्थता जताते रहे हैं। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं, यह तो वही जानें पर एक बात जरूर है कि 3 बार से लगातार मुख्यमंत्री बनते आ रहे नागा पीपुल्स फ्रंट के मुखिया नीफियो रियो को एन.डी.ए. का समर्थक माना जाता है। रियो काफी समय से केंद्र से राज्य के विकास के लिए विशेष पैकेज की मांग कर रहे हैं लेकिन हर बार उन्हें आश्वासन ही मिलता रहा है।

दरअसल, यह विशेष पैकेज एन.डी.ए. की सरकार के दौरान घोषित किया गया था। इस सिलसिले में वह दिल्ली में प्रधानमंत्री से भी मिल चुके हैं। मनमोहन सिंह उनसे बड़े सहृदय दिल से मिलते हैं और जब रियो विशेष पैकेज की बात करते हैं तो मनमोहन अपनी चिर-परिचित कुटिल मुस्कान पेश कर उन्हें चलता कर देते हैं। रियो तो केवल विशेष पैकेज ही मांग रहे हैं जबकि मनमोहन जी अपनी रहस्यमयी मुस्कान बिखेरकर उनसे क्या (समर्थन) मांग रहे हैं, यह बेचारे रियो को समझ नहीं आ रहा। वर्ना, विशेष पैकेज देने में इतना समय थोड़े ही लगता है?    

नामांकन के समय उड़े होश: चुनाव में खड़े प्रत्याशी अपने समक्ष खड़ी किसी भी समस्या को बड़ी सुगमता से निपटाने या मोल्ड करने में माहिर माने जाते हैं, परंतु जब बात हो प्रत्याशी के रूप में पर्चा दाखिल करने की तो उनको भी पसीना आ जाता है। बड़ा अजीब नजारा तब देखने को मिला, जब दलित नेता स्व. बाबू जगजीवन राम की पौत्री मेधावी कीर्ति सासाराम में अपना पर्चा दाखिल करने गईं तो उन्हें आंसुओं से रोता हुआ पाया गया। पता चला कि नामांकन के दौरान उनके कागजात पूरे नहीं थे। उनके पास किसी पार्टी का चुनाव चिन्ह भी नहीं था।

इसी तरह तृणमूल कांग्रेस के दक्षिण दिल्ली सीट से चुनाव लड़ रहे विश्वजीत को निर्वाचन कार्यालय जाकर पता चला कि उन्हें अपना वोटर आईकार्ड साथ लाना चाहिए था। यही नहीं, उस समय केरल के वित्त मंत्री और के.सी. (एम) के अध्यक्ष के.एम. मणि के बेटे जोश के. मणि को झटका लगा जब उनसे कहा गया कि वह अपने दस्तावेजों में ‘पापा’ के दस्तख्त नहीं, पार्टी अध्यक्ष के साइन लेकर आएं। दरअसल, उनके दस्तावेजों पर जो दस्तखत थे वे के.एम. मणि ने बतौर मंत्री के रूप में कर दिए थे और उन पर पार्टी अध्यक्ष की मुहर नहीं लगी थी।

दलों पर परिवारों का कब्जा: राजनीति में परिवारवाद इस कदर हावी है कि लगने लगा है कि इससे उबर पाना अब शायद संभव नहीं। पिता यदि कांग्रेस में है, तो बेटा भाजपा में या किसी और दल में। ढेरों उदाहरण हमारे सामने हैं। हम शुरूआत करते हैं फिल्म स्टार और कभी कांग्रेस के निकट रहे बिग बी अमिताभ बच्चन से। वह गुजरात की भाजपा सरकार के ब्रांड एम्बैसेडर हैं जबकि उनकी पत्नी जया बच्चन उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का चुनाव प्रचार कर रही हैं। मजे की बात यह है कि यह वही सपा है जिसने नरेंद्र मोदी या भाजपा को प्रदेश में नहीं जीतने देने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है जबकि वल्र्ड फेमस पति-पत्नी अलग-अलग दोनों ही दलों का प्रचार कर रहे हैं!

अब बात करते हैं भाजपा की वसुंधरा राजे की। उनका भतीजा ज्योतिरादित्य कांग्रेस में है। अब आते हैं, भाजपा के वरिष्ठ व सुलझे हुए प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद के पास। उनके भाई राजीव शुक्ला कांग्रेस से सांसद हैं और गाहे-बगाहे भाजपा को गरियाते रहते हैं। दो भाई और हैं। राहुल गांधी और वरुण गांधी। दोनों क्रमश: कांग्रेस व भाजपा में शोभा बढ़ा रहे हैं। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे शिवसेना में अपने पिता की गद्दी पर बैठे हैं, तो उनके चचेरे भाई राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई हुई है। दोनों ही प्रतिद्वंद्वी भी हैं।


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