कई रंग दिखा चुके हैं हिमाचल प्रदेश में उपचुनाव

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Tuesday, April 01, 2014-12:27 PM

पालमपुर: हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में कई बार ऐसे मौके आए जब लोकसभा में जीते प्रत्याशी की खाली विधानसभा सीट पर विपक्षी पार्टी हथियाने में सफल रही है। ऐसे उपचुनावों पर नजर दौड़ाई जाए तो 2009 में वीरभद्र सिंह लोकसभा के लिए चुने गए। उनकी खाली हुई विद्यानसभा सीट रोहड़ू में हुए उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी खुशीराम ने कांग्रेस के खिलाफ 8473 मतों से विजय हासिल की। ज्वाली में कांग्रेस को मिली थी जीत इसी तरह 2009 में ही कांगड़ा-चम्बा से राजन सुशांत सांसद बने परंतु उनकी खाली हुई विद्यानसभा सीट ज्वाली में कांगे्रस के सुजान सिंह पठानिया 3580 मतों से विजयी रहे।

ऐसा ही वर्ष 2004 में हुआ जब चंद्र कुमार लोकसभा चुनाव तो जीते परंतु उनकी विधानसभा सीट में हुए उपचुनाव में भाजपा के हरवंस राणा ने 1107 वोटों से जीत दर्ज कर सत्तासीन पार्टी को झटका दिया। वैसे तो सत्ता में होते हुए किसी पार्टी को उपचुनाव जीतना आसान काम होता है परंतु कई बार सरकार के उम्मीदवार हारे हैं। वर्ष 2011 में नालागढ़ के विधायक हरि नारायण सैणी के निधन के बाद खाली हुई सीट को सत्तासीन भाजपा उपचुनाव में हार गई। इसी तरह 1983 में कांग्रेसी विधायक देशराज महाजन के निधन के बाद खाली वनीखेत सीट के लिए उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी आजाद उम्मीदवार नरेंद्र सिंह से हार गया था।


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