रेडियो: लोकसभा चुनाव में रेडियो फिर हुआ जीवंत

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Wednesday, April 02, 2014-2:27 PM

नई दिल्ली: जब आप मेट्रो स्टेशन पहुंचते हैं तो ‘खिला कमल’ आपका स्वागत करता नजर आता है और जब आप सड़क पर खड़े होते हैं तो विज्ञापन पट्टिका पर बना ‘विशाल हाथ’ आपका स्वागत करता नजर आता है, वहीं ‘झाड़ू’ के जरिए ‘सत्ता परिवर्तन के लिए मतदान’ की अपील नजर आ जाती है। इस तरह की कई तरकीबों और ध्यान खींचने वाले विज्ञापनों के जरिए राजनीतिक दल मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। इस चुनाव में टेलिविजन, आउटडोर मीडिया, सोशल मीडिया और नुक्कड़ नाटकों के जरिए धुंआधार प्रचार प्रचार किया जा रहा है।

 

चुनाव प्रचार के इस दौर में चुनाव से संबंधित कई आकर्षक विज्ञापनों और गीतों ने रेडियो को भी दोबारा जीवंत बना दिया है। रेडियो का श्रोता वर्ग देश में करीब 15.8 करोड़ का है और इसलिए राजनीति दल मतदाताओं को लुभाने और ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं तक पहुंच बनाने के लिए रेडियो गीत और विज्ञापन के निर्माण के लिए निजी फर्मों से संपर्क कर रहे हैं। रेडियो के 15.8 करोड़ श्रोताओं में से 10.6 करोड़ श्रोता एफएम रेडियो स्टेशनों को सुनते हैं।

 

भारत के 86 शहरों में लगभग 245 निजी एफएम स्टेशन हैं जिनमें दस राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही हैं। सुबह 7-11 बजे और शाम 5-9 बजे के बीच रेडियो सुनने वालों की संख्या अधिक रहती है और यही कारण है कि इन दोनों समय में रेडियो पर राजनीतिक विज्ञापनों की बाढ़-सी आ जाती है। रेडियो के गीत 30 सेकंड से तीन मिनट तक के होते हैं और इन्हें हर विज्ञापन अंतराल के समय सुनाया जाता है जिससे कभी कभी गीतों के समय में भी कटौती करनी पड़ती है।

 

रेडियो के लिए विज्ञापन और गीत बनाने वाली आई बोर्ड 7 एजेंसी के सहायक उपाध्यक्ष पंकज शर्मा कहते हैं, ‘‘हम अपने ग्राहकों को रणनीतिक चुनाव प्रचार के लिए विचार देते हैं। विज्ञापन के डिजाइन के अलावा इसे लागू करने और जारी करने में भी हमारी भागीदारी होती है। यदि कोई राष्ट्रीय दल किसी स्थानीय इलाके में चुनाव प्रचार करना चाहता है तो हम उन्हें संचार के इस प्रभावी माध्यम के प्र्रयोग की सलाह देते हैं।’’


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