आजमगढ़: चारों तरफ से घिरे मुलायम

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Sunday, April 06, 2014-2:38 PM

आजमगढ़: कैफी आजमी और अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की धरती आजमगढ़ से चुनाव लड़ रहे समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव के खिलाफ छोटे-छोटे मुस्लिम संगठनों के एकजुट होने से इस सीट पर उनकी राह आसान नहीं दिख रही है। मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र में जीत-हार की चाबी अब पूरी तरह मुसलमान मतदाताओं के हाथों में जाती दिख रही है।

मैनपुरी से भी चुनाव लड़ रहे सपा प्रमुख द्वारा शुक्रवार को नामांकन के बाद मैनपुरी सीट नहीं छोडऩे की सार्वजनिक घोषणा को प्रतिद्वन्द्वियों ने उनके खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है और वे मुसलमानों को अपना वोट व्यर्थ नहीं गंवाने की सलाह देकर यादव को ‘पराया’ प्रत्याशी करार देने की जुगत में हैं।

आजमगढ़ से सपा प्रमुख को चुनौती देने के लिये उतरे राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के अध्यक्ष आमिर रशादी का कहना है कि मैनपुरी से भी चुनाव लड़ रहे मुलायम सिंह यादव ने कल उस सीट से नामांकन भरने के बाद कहा कि वह मैनपुरी सीट नहीं छोड़ेंगे। इसका मतलब है कि वह आजमगढ़ की जनता के साथ दगाबाजी करने जा रहे हैं। ऐसे में यहां की जनता, खासकर मुसलमानों को सपा के साथ जाकर अपना मत बेकार नहीं करना चाहिये।

पूर्वांचल के मुस्लिम बहुल इलाकों में खासा प्रभाव रखने वाली पीस पार्टी ने करीब 16 फीसद मुस्लिम आबादी वाले आजमगढ़ से अपना प्रत्याशी खड़ा करने के बजाय उलेमा काउंसिल के उम्मीदवार आमिर रशादी को समर्थन देने का फैसला किया है। राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक खासकर मुस्लिम और यादव मतों पर निर्भर मुलायम की मुश्किलें इस घटनाक्रम से बढ़ सकती हैं।

विश्लेषकों के मुताबिक राष्ट्रीय उलेमा काउंंसिल, कौमी एकता पार्टी, पीस पार्टी और कुछ अन्य मुस्लिम संगठनो के विरोध के साथ ही एएमयू टीचर्स एसोसिएशन भी सपा सुप्रीमो के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं। अगर इसके चलते मुस्लिम मतों का विभाजन होता है तो मुलायम के लिए चुनौती गहरा सकती है।

आजमगढ़ से मुलायम के चुनाव लडऩे की घोषणा से यहां के सपा नेताओं में उत्साह का संचार हुआ था। लेकिन रशादी के तेेवरों और मुस्लिम संगठनों की सपा सुप्रीमो के खिलाफ घेराबन्दी ने सपा नेताओं को न सिर्फ अन्दर तक हिला दिया बल्कि समाजवादी पार्टी नेताओं
को नये सिरे से मंंथन करने पर मजबूर कर दिया है।

वर्ष 2009 में आजमगढ़ में साम्प्रदायिक रुप से बेहद धु्रवीकृत माहौल में भाजपा के रमाकांत यादव सांसद चुने गये थे। इस बार रमाकांत को चुनौती देने के लिए बसपा ने जिले की मुबारकपुर विधानसभा सीट से विधायक शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को टिकट दिया है।
मुलायम के आने से पहले इस सीट पर मुख्य लड़ाई भाजपा और बसपा के बीच ही मानी रही थी लेकिन सपा सुप्रीमो के मैदान में उतरने से लड़ाई रोचक हो गयी है।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यादव मतदाता का झुकाव जाहिर तौर पर मुलायम की तरफ है, लेकिन उनमें से ज्यादातर अब भी भ्रमित हैं। असली सफलता-असफलता मुस्लिमों के रुख से पैदा होगी और तमाम मुस्लिम पार्टियों के साथ ही मुस्लिम संगठनों ने सपा सुप्रीमो का विरोध करने का निर्णय किया है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में गत 24 फरवरी को होने वाले सर सैयद मूवमेंट फोरम के कार्यक्रम में मुलायम को आमंत्रित किया गया था। लेकिन उनके कार्यक्रम की घोषणा होते ही एएमयू टीचर्स एसोसिएशन और छात्रों ने मुजफ्फरनगर दंगों में नाकामी का आरोप लगाते हुए सपा प्रमुख का जबर्दस्त विरोध किया था।

एएमयू टीचर्स एसोसिएशन ने फैसला किया है कि वह आजमगढ़ की जनता से सपा सुप्रीमो को वोट न देने की अपील करेगी। कुुुल मिलाकर सपा केेे सिर मुजफ्फरनगर दंगों का कलंक और बसपा के शाहआलम उर्फ गुड्डू जमाली तथा राष्ट्रीय उलेमा काउंंसिल, कौमी एकता पार्टी, पीस पार्टी और कुछ अन्य मुस्लिम संगठनों के विरोध के साथ ही अब एएमयू टीचर्स एसोसिएशन भी सपा सुप्रीमो के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं।


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