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भारतीय इतिहास में स्वर्ण लिखित है आज का दिन

  • भारतीय इतिहास में स्वर्ण लिखित है आज का दिन
You Are HerePrerak Prasang
Tuesday, April 08, 2014-8:02 AM

भारत के इतिहास में आठ अप्रैल एक महत्वपूर्ण तिथि है। इस दिन कई घटनाएं घटी हैं लेकिन आजादी के इतिहास की दो महत्वपूर्ण घटनाएं विश्व प्रसिद्ध हो चुकी हैं। 8 अप्रैल 1857 को जहां शहीद मंगल पांडेय को फांसी पर चढ़ाया गया था वहीं 8 अप्रैल 1929 को शहीद भगत सिंह ने लाहौर असैम्बली पर बम फैंका था। शायद कम ही लोग जानते हैं कि यदि दोस्तों ने भगत सिंह के युवकोचित प्रेम संबंधों को लेकर ताना नहीं मारा होता तो लाहौर असैम्बली में 8 अप्रैल 1929 को बम फैंकने कम से कम भगत  नहीं जाते। वर्ष 1929 में अंग्रेजी सत्ता को भारत छोडऩे के लिए मजबूर करने के लिए लाहौर असैम्बली में बम फैंकने की योजना बनाई गई थी। इसकी कहानी भी अजब है।

भगत सिंह लाहौर के नैशनल कालेज में पढ़ते थे और उस समय एक लड़की को उनसे प्रेम हो गया था। भगत सिंह के कारण वह भी क्रांतिकारी दल में शामिल हो गई थी। मकसद सिर्फ एक था कि उसे भगत सिंह का साथ मिलता रहे। जब असैम्बली में बम फैंकने की जिम्मेदारी देने की बात आई तो दल के नेता चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह को यह जिम्मेदारी देने से मना कर दिया था। आजाद यह मानते थे कि दल को भगत सिंह की बहुत जरूरत थी।

भगत सिंह के मित्र सुखदेव ने भगत सिंह पर ताना कसा कि वह उस लड़की के कारण बम फैंकने नहीं जा रहे हैं। भगत सिंह इस ताने से काफी दुखी हुए। उन्होंने दबाव बना कर अपना चयन करवाया। भगत सिंह ने सुखदेव के नारी तथा प्रेम पर केन्द्रित पत्र लिखा जो असैम्बली बम धमाके के तीन दिन बाद सुखदेव की गिरफ्तारी के समय प्रकाश में आया। इस पत्र में भगत सिंह ने प्रेम को मानव चरित्र को ऊंचा करने वाली एक अवधारणा बताया था।

भगत सिंह के निकटस्थ सहयोगी शिव वर्मा ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि भगत सिंह कभी शादी नहीं करना चाहते थे। एक बार शादी की चर्चा होने पर घर से भाग गए थे। पारिवारिक दबाव के चलते एक बार तो उनकी शादी तय भी हो गई थी लेकिन वह क्रांतिकारी दल में शामिल थे। उन्होंने शादी से मना करने वाले परिवार को भेजे खत में लिखा था कि उनका जन्म भारत माता को आजादी दिलाने के लिए हुआ है। वह जब तक गुलामी की जंजीर से मुक्त नहीं होते वह किसी और जंजीर में नहीं बंध सकते।

मंगल पांडेय की अमरगाथा भी सन् 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे प्रसिद्ध घटना हो चुकी है। वह क्रांति के अग्रदूत थे। वह संग्राम पूरे हिंदुस्तान के जवानों व किसानों ने एक साथ मिल कर लड़ा था। बेशक इसे ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा बड़ी निर्दयता पूर्वक दबा दिया गया लेकिन उसकी विकराल लपटों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी की चूलें हिलाकर रख दी थीं। इसके बाद ही हिंदुस्तान में अंग्रेजी हुकूमत का आगाज हुआ और अंग्रेजी कानून यहां की जनता पर लागू किए गए ताकि मंगल पांडेय जैसा कोई सैनिक दोबारा शासकों के विरुद्ध ‘विद्रोह’ न कर सके।

भारत की आजादी की पहली लड़ाई अर्थात् 1857 के विद्रोह की शुरूआत मंगल पांडेय से हुई, जब उन्होंने चर्बी लगे कारतूस लेने से मना कर दिया और इस पर विरोध जताया। इसके परिणामस्वरूप मंगल पांडेय के हथियार छीन लिए जाने व वर्दी उतार लेने का फौजी हुक्म हुआ। मंगल पांडेय ने उस आदेश को मानने से इंकार कर दिया और 29 मार्च सन् 1857 को उनकी राइफल छीनने के लिए आगे बढ़े अंग्रेजी अफसर मेजर ह्यूसन पर हमला कर दिया।

आक्रमण करने से पूर्व उन्होंने अपने अन्य साथियों से उनका साथ देने का आह्वान भी किया था किन्तु कोर्ट मार्शल के डर से जब किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया तो उन्होंने अपनी ही राइफल से उस अंग्रेज अधिकारी मेजर ह्यूसन को मौत के घाट उतार दिया जो उनकी वर्दी उतारने और राइफल छीनने को आगे आया था।

इसके बाद विद्रोही मंगल पांडेय को अंग्रेज सिपाहियों ने पकड़ लिया। उन पर कोर्ट मार्शल द्वारा मुकद्दमा चला कर 6 अप्रैल 1857 को मौत की सजा सुना दी गई। कोर्ट मार्शल के अनुसार उन्हें 18 अप्रैल 1857 को फांसी दी जानी थी परन्तु इस निर्णय की प्रतिक्रिया कहीं विकराल रूप न ले ले, इसी कूट रणनीति के तहत क्रूर ब्रिटिश सरकार ने मंगल पांडेय को निर्धारित तिथि से दस दिन पहले ही 8 अप्रैल सन् 1857 को फांसी पर लटका कर मार डाला था।

                                                                                                                                                                         —प्रशांत मिश्रा


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