मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पत्ति

  • मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पत्ति
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Friday, December 19, 2014-9:11 AM

एक भारतीय संन्यासी विदेश यात्रा पर गया। वहां के एक प्रमुख राजनेता ने संन्यासी से पूछा, ‘‘मैंने सुना है, आप स्वयं को सम्राट कहते हैं? किन्तु जिसके पास एक पैसा भी नहीं हो, वह सम्राट कैसे बन सकता है?’’

संन्यासी ने कहा ‘‘जिसके जीवन में संतोष और आनंद का सागर लहराता है, जो किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता तथा जो स्वयं पर अनुशासन रखता है वही सच्चा सम्राट होता है।’’

संन्यासी ही नहीं, एक गृहस्थ भी सच्चा सम्राट बन सकता है, बशर्ते उसके जीवन में संयम हो, वह मात्र लेना ही नहीं देना भी जानता हो, आत्मानुशासी हो और संतुलित अर्थनीति का ज्ञाता हो। अर्थ (धन) के बिना जीवन- यात्रा अच्छी तरह सम्पन्न नहीं हो सकती। जीवन-यापन के लिए अर्थ की आवश्यकता भी है और उपयोगिता भी। अर्थ के अर्जनकाल में ईमानदारी और उपभोगकाल में सदुपयोग जैसे सिद्धांत आचरण में आ जाएं तो संतुलित अर्थनीति बन सकती है।

अर्थ अपने आप में एक सम्पत्ति है और ईमानदारी उससे भी बड़ी सम्पत्ति है। अर्थ ऐसी सम्पत्ति है जो कभी भी धोखा दे सकती है और अधिक से अधिक वर्तमान जीवन तक व्यक्ति के पास रह सकती है। विश्वविजेता सिकंदर जब अंतिम सांसें गिन रहा था, उसे बहुत दुख और आश्चर्य हुआ कि ये धन के भंडार मुझे मौत से नहीं बचा सकते। उसने प्रधान सेनापति को यह आदेश दिया कि शवयात्रा के दौरान मेरे दोनों हाथ कफन से बाहर रखे जाएं ताकि जनता इस सच्चार्ई को समझ सके कि ‘‘मैं एक तार भी साथ नहीं ले जा रहा हूं। मैं खाली हाथ ही आया था और खाली हाथ ही जा रहा हूं जबकि ईमानदारी एक ऐसी सम्पत्ति है जो व्यक्ति को कभी धोखा नहीं दे सकती। और वर्तमान जीवन तक ही नहीं, आगे भी व्यक्ति का साथ निभा सकती है। यदि अर्थ के अर्जन में ईमानदारी नहीं रहती, अहिंसा नहीं रहती, अनुकंपा का भाव नहीं रहता तो अर्थनीति असंतुलित बन जाती है। ईमानदारी अहिंसा का ही एक आयाम है। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके जीवन में ईमानदारी बोलती है।’’

सुजानगढ़ निवासी श्रावक-भूषण श्री रूपचंद जी सेठिया का जीवन आदर्श जीवन था। वे कपड़े का व्यापार करते थे। एक दिन दुकान पर कोई ग्राहक आया। मुनीम जी ने कपड़े का निर्धारित मूल्य उसे बता दिया। ग्राहक ने आग्रह किया कि कपड़े का मूल्य कुछ कम किया जाए। मुनीम जी ने कपड़े का मूल्य कम कर दिया और साथ में उसे कुछ कपड़ा भी कम दे दिया। जब रूपचंद जी दुकान में आए तो मुनीम जी ने सारी बात बता दी। सेठ जी ने उपालंभ देते हुए कहा ‘‘आपने बेईमानी क्यों की? उसे कपड़ा कम क्यों दिया?’’

सेठ जी ने उस ग्राहक को वापस बुलाया और उसका हिसाब किया और साथ में मुनीम जी का हमेशा के लिए हिसाब कर दिया और कहा, ‘‘मुझे ऐसा मुनीम नहीं चाहिए जो किंचित भी अप्रामणिकता का कार्य करे।’’

प्रस्तुति : देवेंद्र भूपेश, प्रेमराज बम्बोली


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