गुम होता पतंगबाजी का शौक

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Saturday, January 24, 2015-11:18 AM

पतंगबाजी से प्यार करने वाले राम दुलारे गुप्ता दिल्ली के सर्वाधिक पुराने पतंगबाजी क्लब ‘द यूनियन काइट क्लब’ के संस्थापक हैं। वह पतंगबाजी को ‘आकाश में कागज और मांझे की जंग बताते हैं।’

देश की राजधानी दिल्ली की बात करें तो वहां भी शहर के पुराने इलाके के लोगों में ही पतंगबाजी का अधिक शौक बचा है। अब उनकी संख्या भी तेजी से कम हो रही है। शहर में पतंग उड़ाने के लिए खाली स्थानों की कमी की वजह भी है जो रविवार को समय बिताने के लिए पसंद किए जाने वाले इस शौक में कमी हुई है।
 
राम दुलारे के अनुसार सरकार भी पतंगबाजी के लिए खुले स्थानों की उनकी मांग को पूरी तरह अनदेखा कर देती रही है। 75 वर्षीय राम दुलारे ने 6 वर्ष की आयु में पतंग उड़ाना शुरू किया था और 1967 में लखनऊ में आयोजित पहला ऑल इंडिया टूर्नामैंट जीता था। उन्होंने ‘द यूनियन काइट क्लब’ की शुरूआत 1956 में केवल 6 सदस्यों से की थी। आज वह चावड़ी बाजार स्थित अपनी रिहायश की दूसरी मंजिल पर रहते हैं। इसकी एक मंजिल पुराने जमाने की उनकी पतंगों से भरी पड़ी है। वह कहते हैं कि जिन कारीगरों ने इन पतंगों को बनाया आज वे नहीं हैं और दुख की बात यह है कि इस कला को अगली पीढ़ी को सिखाना भी संभव नहीं लगता। 
 
उनके चार बेटों में से 2 बेटे 39 वर्षीय मनीष तथा 42 वर्षीय सुनील गर्व से अपने पिता के पतंगों तथा मांझे का विशाल संग्रह दिखाते हैं। उनके संग्रह में चांदी से बनी पतंग तथा वे पतंगें भी शामिल हैं जिनसे उन्होंने कई प्रतियोगिताएं जीती थीं। 
इन दोनों को अपने पिता से विरासत में केवल पतंगों का यह संग्रह ही नहीं, पतंग उड़ाने के पैंतरे भी मिले हैं। अब वे दोनों ही अपने पिता के क्लब को चला रहे हैं जिसके कुल 10 सदस्य हैं। उन्होंने वर्ष 2002, 2007, 2009 तथा 2012 के आल इंडिया पतंगबाजी प्रतियोगिताएं जीती हैं। 
 
राम दुलारे के पास पतंगबाजी से जुड़ी कहानियों की भी कोई कमी नहीं है। 1962 में वह एक मैच के लिए कोलकाता गए थे। वहां पतंगबाजी में उनकी कुशलता देख कर एक व्यक्ति उनके पास आया जो चाहता था कि वह यौन कर्मियों के एक समूह के साथ पतंग लड़ाएं। राम दुलारे के अनुसार, ‘‘उसकी बात सुन कर पहले तो मैं दंग रह गया लेकिन मैंने विनम्रता से इंकार कर दिया कि मैं केवल अन्य क्लबों के साथ ही पतंगबाजी करता हूं।’’ 
 
रामदुलारे तथा उनके बेटे सुनील एक मैच की यादें ताजा करते हुए बताते हैं कि मुरादाबाद में पतंगबाजी के मुकाबले के दौरान एक आदमी ने उन पर सट्टा लगाया जो डेढ़ लाख रुपए जीतने में कामयाब रहा। बाद में उसने उन्हें अपने घर आमंत्रित किया। 
 
असल में, लखनऊ तथा बरेली जैसे स्थानों पर लोग कभी-कभी पतंगबाजी के मुकाबलों के दौरान सट्टेबाजी भी किया करते थे। कई बार कुछ प्रतियोगी जानबूझ कर मैच हारते जो क्रिकेट में मैच फिक्सिंग जैसा होता था। 
 
दिल्ली की बात करें तो कुछ साल पहले तक पतंगबाजी के शौकीन शांति वन या रामलीला मैदान में पतंग उड़ा सकते थे। परन्तु अब वे बुराड़ी में स्थित निरंकारी ग्राऊंड तक ही सीमित होकर रह गए हैं। 
 
रामदुलारे बताते हैं, ‘‘अब अगर हम राजघाट या अन्य पुराने इलाकों पर पतंग उड़ाते हैं तो वहां मांझे के गिरने की वजह से दोपहिया वाहन चालकों को चोट लग सकती है इसलिए सरकार ने भी वहां पतंगबाजी पर पाबंदी लगा दी है।’’
 
जिस अन्य समस्या का सामना पतंगबाजों को करना पड़ रहा है वह है महंगे होते जा रहे पतंग। किसी समय 2 रुपए में मिलने वाली पतंग आज 40 रुपए जबकि मांझे की कीमत 100 रुपए से बढ़ कर 1500 रुपए तक हो गई है।  
 
प्रिंटिंग प्रैस चलाने के अलावा पतंग बनाने का काम करने वाले सुनील के अनुसार इनकी कीमतों को नियंत्रित करने पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है। 
 
उनके परिवार को इस बात का मलाल भी है कि वर्तमान पीढ़ी अपने मोबाइल फोनों में इतनी व्यस्त है कि पतंगबाजी से दूर हो चुकी है। सुनील के अनुसार, ‘‘नई पीढ़ी का सारा ध्यान कम्प्यूटरों और मोबाइल फोन्स में लगा रहता है। अब युवा रविवार को भी पतंग उड़ाने के लिए छत पर आना नहीं चाहते। लोगों को पतंग उड़ाने चाहिएं, इससे हाथों का अच्छा व्यायाम होता है और नजर भी ठीक रहती है क्योंकि दूर आकाश में पतंग पर नजर टिका कर रखनी पड़ती है।’’
 
राम दुलारे के ये दोनों बेटे अपनी मर्जी से कुंवारे हैं और जानते हैं कि उनके बाद उनके क्लब को चलाने वाला शायद कोई न हो। हालांकि उनके मन में आशा कायम है कि उनका पतंगबाजी क्लब कभी बंद नहीं होगा।
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