शहीदों को प्रणाम

  • शहीदों को प्रणाम
You Are HereNational
Sunday, March 23, 2014-4:01 PM

भारत की आज़ादी के इतिहास में शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव का नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है, जो अपनी अंतिम सांस तक अंग्रेजो से लड़ते रहें। 23 मार्च 1931 के दिन भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को लाहौर के सैंट्रल जेल में फांसी पर चढ़ाया गया, तो पूरे देश में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश की लहर तेज हो गई। आज़ादी के यह दीवाने  देशभगती के गीत गाते हुए फांसी के फंदे की तरफ बढ़ रहे थे। फांसी के तख्ते पर चढ़ कर पहले तो तीनों ने फांसी के फंदे को चूमा और फिर अपने ही हाथों से उस फंदे को ख़ुशी-ख़ुशी अपने गले में डाल लिया।

यह देख कर जेल के वार्डन ने इन तीनों नौजवानों प्रति हमदर्दी जताते हुए कहा थी कि इन नौजवानों के दिमाग़ बिगड़े हुए हैं, यह पागल है। तब सुखदेव ने उस वार्डन को यह गीत सुनाया था-
इन बिगड़े दिमागों में घनी ख़ुश्बू के लच्छे है।
हमें पागल ही रहने दो, हम पागल ही अच्छे है।
इसके साथ ही तीनों क्रांतिकारी फांसी के फन्दे पर झूल गए। यह तीनों ही विलक्षण क्रांतिकारी विचारधारा के प्रेक्षक थे। तभी तो फांसी लगने से कुछ पल पहले तक जहां भगत सिंह एक मार्कसवादी पुस्तक पढ़ रहे थे। वही, सुखदेव कुछ गीत गुनगुना रहे थे और राजगुरू वेदों के मंत्र उच्चारण कर रहे थे।

जीवन की मस्ती इन को डी. ए. वी. कालेज लाहौर में गुरूकुल कांगड़ी यूनिवर्सिटी, हरिद्वार के ग्रैजुएट जयनन्द विद्यालकार के विचारों से प्राप्त हुई थी। यह नौजवान भारत सभा के सक्रिय मैंबर और हिंदुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन आर्मी के अनोखे योद्धा थे। तीनों की मित्रता इसलिए भी मज़बूत थी क्योंकि उनकी विचारधारा एक समान थी। राजगुरू ने वाराणसी में पढ़ाई के साथ-साथ संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया था। उन्होंने वहां रहते हुए जहाँ धर्म ग्रंथों और वेदों का अध्ययन किया, उस के साथ ही ‘लघु सिद्घांत कौमुदी’ जैसे ग्रंथ का अध्ययन किया, जोकि इन्हें जुबानी याद थी। इन को कसरत का बहुत शौक था और वह छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध शैली के बहुत प्रशंसक थे। इसी तरह सुखदेव को खतरों से खेलने की आदत सी पड़ गई थी। उनकी स्मरण शक्ति भी कमाल की थी।

भगत सिंह जन्म से आज़ाद खयालों के व्यक्ति थे। अपने पिता सरदार किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह के आज़ाद विचार उनकी रग-रग में समाए हुए थे। पांच साल की उम्र में जब वह अपने पिता के साथ खेतों में गए तो वहां कुछ तिनके इकठ्ठा कर बीजने लगे। पिता ने हँस कर पूछा कि यह क्या कर रहा है?  भगत सिंह ने कहा कि मैं बंदूके बीज रहा हूँ, इनसे बहुत सी बंदूकें उग आएगी और इनका इस्तेमाल अंग्रेजी हकूमत के खि़लाफ़ की जाएगा। बेटे की ऐसी राष्ट्रीय भावना देख कर उनके पिता हैरान रह गए।

इन तीनों ही साथियों ने साइमन कमीशन का भी खूब विरोध किया। पुलिस की धक्केशाही से लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए और 17 नवंबर 1928 को उनका देहांत हो गया। भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव और उनके साथियों ने लाला जी की मौत का बदला लेने की योजना बनाई। चंद्र शेखर आज़ाद और राजगुरू ने 17 दिसंबर 1928 को मिलकर पुलिस प्रमुख सांडर्स की गोली मारकर हत्या कर दी। इस घटना के तुरंत बाद सरदार भगत सिंह भेस बदल कर कलकत्ता के लिए रवाना हो गए। कलकत्ता में रहते भगत सिंह ने बम बनाना सीखा। भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव का यह दृढ़ निश्चय था कि ग़ुलाम भारत की जंजीरों को अहिंसा की नीतियों के साथ नहीं काटा जा सकता।

इसी कारण भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त ने 8अप्रैल 1929 को सैंट्रल असेंबली के अंदर बम फेंका और साथ ही विजीटर्स गैलरी में खड़े हो कर शांतीपूर्ण ढंग के साथ पर्चे बाँटते रहे। इन पर्चो पर उन्होंने अपना उद्देश्य भारत माता की पूर्ण आज़ादी लिखा हुआ था और इंकलाब जि़ंदाबाद के नारे भी लगाते रहे। उनका उद्देश्य किसी का कत्ल करना नहीं था, बल्कि देश की जनता में जागरूकता पैदा करना था। बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ख़ुद को पुलिस हवाले कर दिया। बम फेंकने के दोष में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को 7अक्तूबर 1930 को फांसी की सज़ा सुनाई गई। इसका हर तरफ विरोध होने के बावजूद 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में भारत माता के तीनों सपूतें को फांसी दे दी गई और पुलिस ने उनकी लाशें को रात के समय फिऱोज़पुर (पंजाब) में जला दिया।

इन तीनों की मौत से देश में शोक की लहर फैल गई। कांग्रेस ने भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की शहीदी में एक प्रस्ताव पास किया। देश में इन शहीदों की कुर्बानी के दिन को यानि की 23 मार्च को शोक-दिवस के रूप में मनाया गया। भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव के देश प्रेम और कुर्बानी ने नौजवानों और क्रांतिकारियों में राष्ट्रीय चेतना का तेज़ी से संचार किया। इन बहादुरों ने अपने क्रांतिकारी कार्यो से अंग्रेज़ी साम्राज्य की जड़ें हिला दी, जिसके साथ कुछ समय के बाद ही अंग्रेज़ों का विशाल साम्राज्य खत्म होता गया।

विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You